नई दिल्ली, 16 जुलाई (ता)। सुप्रीम कोर्ट ने यौन अपराधों के मामले में न्यायिक संवेदनशीलता के बारे में नेशनल ज्यूडिशियल एकेडमी (एनजेए) की ओर से तैयार व्यापक दिशा-निर्देशों को पूरे देश में लागू करने का निर्देश दिया। इन दिशा-निर्देशों का मकसद अदालतों को यौन अपराधों के पीड़ितों के प्रति ज्यादा संवेदनशील और सहानुभूतिपूर्ण बनाना है। चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी मोहना की पीठ ने निर्देश दिया कि इस रिपोर्ट को देशभर के सभी हाई कोर्ट, जिला अदालतों, राज्य कानूनी सेवा प्राधिकरणों, राज्य विधि विभागों और अभियोजन निदेशालयों तक पहुंचाया जाए। पीठ ने अभियोजन निदेशालयों को यह भी निर्देश दिया कि वे सुनिश्चित करें कि ये दिशा-निर्देश सभी संबंधित अधिकारियों तक पहुंचें और पुलिसकर्मियों को उन सुरक्षा उपायों के बारे में संवेदनशील बनाया जाए जिनका पालन यौन अपराध मामलों में प्राथमिकी दर्ज करते समय और चार्जशीट दाखिल करते समय किया जाना चाहिए। दिशा-निर्देशों की इस रिपोर्ट को टीम की एक शानदार कोशिश बताते हुए सीजेआई ने एनजेए भोपाल की ओर से गठित समिति के काम की सराहना की। ये दिशा-निर्देश 2025 में सुप्रीम कोर्ट की ओर से एक स्वतः संज्ञान मामले की सुनवाई के बाद तैयार किए गए हैं। शीर्ष कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक फैसले के बाद स्वतः संज्ञान कार्यवाही शुरू की थी। हाईकोर्ट के उस फैसले में कहा गया था कि नाबालिग के स्तन को पकड़ना और उसकी सलवार की डोरी खोलने की कोशिश, दुष्कर्म की तैयारी तो है, पर उसे दुष्कर्म की कोशिश नहीं माना जा सकता। हाईकोर्ट के फैसले को बच्चों के अधिकारों के लिए काम करने वाली संस्था जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रन ने चुनौती दी थी। 26 मार्च, 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने यौन अपराधों से जुड़े अदालती आदेशों में इस्तेमाल होने वाली असंवेदनशील भाषा व शब्दावली के मुद्दे पर स्वतः संज्ञान लिया था, खासकर उन मामलों में जिनमें पीड़ितों में महिलाएं व बच्चे शामिल थे। शीर्ष कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले को रद्द कर दिया और कहा कि यह फैसला साफ तौर पर गलत था।
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