लखनऊ के अलीगंज स्थित कोचिंग सेंटर के बाद अब लगता है कि सरकार पूरी तौर पर कई विभागों की कार्यप्रणाली सुधारने का मन बना चुकी है। बीती 22 जून को अलीगंज के कोचिंग सेंटर में लगी आग में १५ युवाओं की मौत हो गई थी में अब खबरों के अनुसार कई जिलों के डीएम सहित नौ आईएएस, नौ पीसीएस और १४ अधिशासी अधिकारी व सहायक अभियंता व ५२ अवर अभियंताओं की सूची कार्रवाई के लिए एसआईटी द्वारा शासन को भेजी जा रही बताई जाती है। इससे संबंध खबर के अनुसार लखनऊ में गत 22 जून को अलीगंज सेक्टर डी में अवैध बिल्डिंग में लगी भीषण आग की जांच कर रही एसआइटी ने नौ आईएएस व नौ पीसीएस अधिकारियों पर कार्रवाई करने की सिफारिश की है।
सभी अधिकारी लखनऊ विकास प्राधिकरण (एलडीए) में तैनात रहे हैं। इनमें से कुछ जिलाधिकारी के पद पर, कुछ एलडीए में ही तैनात है, वहीं दो अधिकारी सेवानिवृत्त हो चुके हैं। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की सख्ती पर एसआइटी रिपोर्ट तैयार हो चुकी है और जल्द ही शासन को सौंपी जाएगी। पहली बार आइएएस व पीसीएस अधिकारियों की भूमिका की जांच हो रही है। माना जा रहा है कि नियुक्ति विभाग संबंधित अधिकारियों को कारण बताओ नोटिस देकर जवाब-तलब कर सकता है।
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की सख्ती पर एसआईटी रिपोर्ट तैयार हो चुकी है और जल्द ही शासन को सौंपी जाएगी। माना जा रहा है कि इसके बाद नियुक्ति विभाग संबंधित अधिकारियों को कारण बताओ नोटिस देकर जवाब-तलब कर सकता है। इस घटना में 15 लोगों की मौत हुई थी और नौ लोग झुलसे थे।
मुख्यमंत्री खुद भी मौके पर गए थे और दोषियों पर सख्त कार्रवाई के लिए एसआईटी का गठन किया था। एसआईटी ने एलडीए से 2016 से 2024 तक जोन चार व पांच में तैनात रहे प्रवर्तन व जोनल अधिकारियों की सूची मांगी थी। खासकर अग्निकांड वाले आवासीय भूखंड पर व्यावसायिक निर्माण के दौरान एलडीए में तैनात अफसरों को घटना के लिए जिम्मेदार माना जा रहा है।
इसी कारण एलडीए ने सौ से अधिक अधिकारियों व कर्मचारियों के नाम एसआईटी को भेजे हैं। आईएएस अधिकारियों में लखनऊ के मौजूदा नगर आयुक्त गौरव कुमार, तत्कालीन एलडीए उपाध्यक्ष मैनपुरी के जिलाधिकारी इंद्रमणि त्रिपाठी और तत्कालीन एलडीए सचिव अमेठी के जिलाधिकारी पवन गंगवार, सत्येंद्र यादव, शिवाकांत द्विवेदी, अक्षय त्रिपाठी, एमपी सिंह, ऋतु सुहास और श्रीश चंद्र वर्मा हैं।
इनके साथ ही पीसीएस अधिकारी में अमित राठौर, विपिन शिवहरे, श्रद्धा चौधरी, प्रिया सिंह, संगीता राघव, प्रभाकर सिंह, डीके सिंह, विश्व भूषण मिश्र और सुशील प्रताप सिंह अलग-अलग पदों पर तैनात रहे। इनमें कई अफसर इस समय भी एलडीए में तैनात हैं। इंजीनियरिंग विभाग से 14 अधिशासी अभियंता व सहायक अभियंता और 52 अवर अभियंताओं की सूची भेजी गई है। सूत्र बताते हैं कि एसआइटी की जांच रिपोर्ट में इनमें से अधिकांश पर कार्रवाई करने की सिफारिश की गई है। अब नियुक्ति विभाग जल्द ही आरोपितों को नोटिस जारी करके जवाब तलब करेगा, क्योंकि एसआइटी की रिपोर्ट जल्द ही शासन को सौंपी जाएगी।
सात दिन में देनी थी रिपोर्ट, 15 दिन में नहीं सौंपी
अलीगंज सेक्टर डी के भूखंड संख्या एमएस 102 पर बने अवैध भवन में गेमिंग जोन व अन्य दफ्तर चल रहे थे। घटना के बाद शासन ने इस मामले की एसआइटी जांच के लिए अपर मुख्य सचिव पर्यटन अमृत अभिजात व अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक लखनऊ जोन प्रवीण कुमार को जिम्मेदारी सौंपी और सात दिन में रिपोर्ट मांगा था। इस मामले में आरोपित भवन स्वामी वीरेंद्र प्रसाद शुक्ल व तीन अन्य को जेल भेजा गया था, जबकि सुरेंद्र प्रसाद शुक्ल अभी फरार है और उस पर पचास हजार रुपया का इनाम घोषित किया गया है। 24 व 25 जून को एसआईटी टीम ने दो बार घटना स्थल का निरीक्षण किया। इसके बाद 26 जून को आरोपित भवन स्वामी वीरेंद्र प्रसाद शुक्ल को नोटिस तामील की गई। इस मामले में शासन ने चार इंजीनियरों व एक सुपरवाइजर को निलंबित कर दिया। 27 जून को एसआइटी ने अधिकांश गवाहों व संबंधित अधिकारियों के बयान पूरे किए।
अलीगंज की इमारत पुलिस अभिरक्षा में सौंपकर सुनवाई की प्रक्रिया शुरू हुई। तीन जुलाई को एसआइटी की जांच पूरी हो गई है, सात दिन से जांच रिपोर्ट शासन को सौंपने का इंतजार किया जा रहा है। उधर, विहित न्यायालय में अवैध भवन की सुनवाई सात जुलाई से चल रही है। यह पूरा होते ही भवन ढहाने की प्रक्रिया तेज होगी।
२०१६ से २४ तक लखनऊ विकास प्राधिकरण में रहे और खासकर अग्निकांड वाले निर्माण के लिए दोषियों की सूची एसआईटी ने एलडीए से मांगी थी। मान्य मुख्यमंत्री जी उत्तर प्रदेश में ऐसे अग्निकांड पिछले पांच वर्षो में काफी हो चुके हैं। यह भी स्पष्ट है कि जिन इमारतों में घटनाएं हुई उनके निर्माण में अनियमितताओ के लिए प्राधिकरण, नगर निगम और आवास विकास के अधिकारी काफी बड़्ी तादात में शामिल रहने की बात सामने आ रही है। लेकिन लखनऊ में इतनी बड़ी घटना और कार्रवाई के बाद भी मेरठ विकास प्राधिकरण और नगर निगम व आवास विकास के अफसर आवासीय भूमि पर हुए कॉमर्शियल निर्माण, कच्ची कॉलोनियों, सरकारी जमीन पर बने निर्माणों के खिलाफ मुख्यमंत्री के निर्देशों के तहत कार्रवाई नहीं कर रहे। और सिर्फ कागजी चक्रव्यूह में फंसाकर हर मामले को टाल रहे हैं। इतना ही नहीं यूपी सीएम के जनशिकायत पोर्टल पर शिकायतों का निस्तारण फर्जी तरीके से करने में इन विभागों के अफसर महारथ हासिल कर चुके हैं। नागरिकों की इस बात से मैं भी सहमत हूं कि लखनऊ विकास प्राधिकरण के अफसरों व अभियंताओं की सूची जिस प्रकार बनाई जा रही है उसी प्रकार मेरठ विकास प्राधिकरण और नगर निगम व आवास विकास के अफसरों की भी ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए पिछले १५ साल की सूची तैयार कराकर देखा जाए कि जो घटनाएं हुई और सरकारी नीति के खिलाफ काम हुए उनमं कार्रवाई न करने वाले कौन अधिकारी हैं। शायद पहली बार लखनऊ प्रकरण के बाद सेवानिवृत हो चुके चार वरिष्ठ अधिकारियों के खिलाफ भी कार्रवाई शुरू हुई है जो अपने आप में बडी बात है। जानकारों की यह बात सही है कि रिटायर ना सही वर्तमान अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई हो तो करोड़ों की सरकारी भूमि कब्जा मुक्त होगी और कच्ची कॉलोनी व अवैध निर्माणों की भी फाइलें खुलेंगी जिनमें छोटी दुकान का नक्शा पास है और बड़े शोरुम चल रहे हैं। इसमें गढ़ रोड पर स्थित हल्दीराम के शोरुम को विशेष तौर पर देखा जा सकता है जिसमें आपदा के समय कोई सुविधा नहीं बताई जाती।
(प्रस्तुतिः- रवि कुमार बिश्नोई संपादक दैनिक केसर खुशबू टाइम्स मेरठ)
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