कच्चे तेल के लिए औरों पर आश्रित रहने के लिए व्यवस्था में कमी लाने के लिए पेट्रोल में इथनॉल मिलाने की चर्चा आजकल जोरों पर है। सरकार का कहना है कि ई-२० को नया या बिना परीक्षण इंजन वाला नहीं है। कई देशों में यह उपयोग हो रहा है। अमेरिका ब्राजील कनाडा और यूरोपीय देशों में अलग स्तर पर इथनॉल का मिश्रण होता है। देश में इसे लागू करने से पहले विभिन्न तकनीकी संस्थानों और निर्माणकर्ताओं ने परीक्षण किया गया। सरकार का यह दावा है कि पूरी प्रक्रिया वैज्ञानिक अनुसंधान और मानकों के आधार पर बढ़ाई गई है। इस ईंधन से इंजन के पुर्जो पर प्रभाव नहीं पाया गया है। सरकार जो कह रही है वो भी सही है लेकिन नागरिकों की शंका का भी समाधान होना चाहिए क्योंकि अगर इथनॉल मिश्रित पेट्रोल कोई भी नुकसान होता है तो आम आदमी उसे झेलने की स्थिति में नहीं है। भ्रम को दूर किया जाना वक्क्त की सबसे बड़ी आवश्यकता है। इस विषय पर सवाल उठते हैं और सरकार की तरफ से कहा जाता है कि एथनॉल का प्रयोग चरणात्मक प्रकिया है। तब जनता के मन में शंकाएं जन्म लेती है यदि वह अभिविस्तान के मूल्य चरण में है तो करोड़ों वाहन चालको को जानकारी और सुरक्षा मिलनी चाहिए। बड़ा प्रश्न है कि जवाबदेही होना जरुरी है।परिवर्तन के दौरान लाखों वाहनों के इंजन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है तो इसकी जिम्मेदारी कौन लेगा। क्या पूरे देश को प्रयोगशाला बनाना उचित है क्योंकि वर्तमान समय में ग्राहकों को यह स्पष्ट जानकारी नहीं मिलती है कि एथनॉल की वास्तविक मात्रा कितनी है। इससे पर्यावरण संतुलन सहित हर उस नीति का स्वागत किया जाना चाहिए जिसका उददेश्य ऊर्जा संरक्षण किसानों को बढ़ाना हो। लेकिन पारदर्शी वैज्ञानिक आधार से जवाबदेही से तय होती है। करेाड़ों वाहन चालक प्रयोगशाला का हिस्सा नहीं बनने दिए जा सकते। इसलिए कौन सा मिश्रित ईंधन उपलब्ध है उसके बारे में साफ हो और हर पेट्रोल पंप पर इथनॉल मिश्रण की मात्रा वाले बोर्ड लगे हो। वरना पहले एथनॉल और पेट्रोल के मिश्रण की पूरी तौर पर उपयोगिता तय हो । असमंजस की स्थिति में नागरिकों की आर्थिक स्थिति को प्रभावित करने की मंजूरी किसी को नहीं दी जानी चाहिए।
स्मरण रहे कि उपभोक्ता पहले ही परेशान है क्योंकि हमेशा पढ़ने सुनने को मिलता है कि पेट्रोल डीजल पूरा नहीं नाप रहे। तेल में मिलावट करते हैँ। अभी तक इन आरोपों का समाधान नहीं हो पाया है। ऐसे में अब यह एथनॉल मिश्रित पेट्रोल अगर कोई परेशानी पैदा करने वाला होगी तो वाहन चालक तो टूटकर ही रह जाएगा। हर अच्छी नीति और समाजहित की बात का समर्थन तो होना चाहिए लेेकिन इससे पहले वाहन उपभोक्ताओं की संतुष्टि व जो सुविधाएं सरकार तय कर रही है उसका लाभ पेट्रोल पंप संचालक हजम ना कर जाएं वो वाहन संचालकों को मिले यह तय किया जाना जरुरी है क्योंकि जितना देखने में आ रहा है जिलों में तेल कंपनियां जिला पूर्ति विभाग बाटमाप तौल विभाग आदि अपनी जिम्मेदारी को शासन की नीति के तहत नहीं निभा रहा है। सब लीपापोती करने में लगे हैं। अगर उपभोक्ता आवाज उठाता है तो ज्यादातर पेट्रोल पंप कर्मचारी मारपीट करते हैँ। ऐसे में यह पूछना कि पेट्रोल में कितना इथनॉल है अपनी आफत को बुलावा देना ही कहा जा सकता है। सरकारी नियमों का आधा पालन भी नहीं हो पा रहा। प्रधानमंत्री की भावनाओं के तहत सभी पेट्रोल पंपों पर शौचालय भी उपलब्ध नहीं है और हैं तो वो स्वच्छ नहीं है। हवा भरने वाले उपकरण सही नहीं रहते। इन बिंदुओं का समाधान पेट्रोल पंप संचालकों द्वारा किया जाना जरुरी है। अगर एथनॉल से नुकसान नहीं है तो हमें भी ऐतराज नहीं है।
क्योंकि कहा जा रहा है कि अमेरिका सहित कई देशों में एथनॉल मिश्रित पेट्रोल की खपत है लेकिन यह नहीं बताया जा रहा है कि यह कितना मिलाया जाता और हम कितना मिला रहे हैं।
(प्रस्तुतिः- रवि कुमार बिश्नोई संपादक दैनिक केसर खुशबू टाइम्स मेरठ)
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