बढ़ती आबादी को आवास उपलब्ध कराने और रोजगार के लिए जगह के लिए जंगलों पहाड़ों के हो रहे दोहन से पक्षियों का ठिकाना छिना जा रहा है। शहरों व गांवों में पक्के मकान बनने लगे हैं और ज्यादातर नागरिक नहीं चाहते कि कोई पक्षी वहां घोंसला बनाएं। इससे पक्षियों कहां जाएं। इसका समाधान सामने आ रहा है। कनाडा में पर्यावरण विशेषज्ञों ने नया तरीका निकाला है। पेड़ों पर पक्षियों के लिए घरनुमा होटल बनाए गए हैं। बताते हैं कि इससे २० हजार मधुमक्खियों की प्रजाति को बचाने का प्रयास है। लकड़ी और कार्ड बोर्ड टयूब से बने इन होटलों की तरह अगर हम पेड़ों पर इस तरह के होटलनुमान घर बनाकर टांगे तो कई समस्याओं का समाधान हो सकता है। विलुप्त होती पक्षियों की प्रजातियां जीवित हो सकती है। तोते गौरेया जैसे पक्षी भी इनमें रह सकते हैँ। इस ओर ध्यान दिया जाए तो पक्षियों की समस्या दूर हो सकती हैं। एक खबर के अनुसार कनाडा में पर्यावरण विशेषज्ञों ने अलग-अलग प्रजातियों को एक जगह इक्ऋा करने का अजब तरीका निकाला। उन्होंने 200 छोटे-छोटे कृत्रिम श्मधुमक्खी होटल्य बनाए, जहां बड़ी संख्या में मधुमक्खियों की प्रजातियां रख सकती हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार, दुनिया की 90 फीसदी मधुमक्खियां अकेली रहती हैं। इनका कोई छत्ता या रानी नहीं होती। ये पेड़ों के खोखले तनों या लकड़ी के छेदों में अकेले ही अंडे देती हैं। शहरीकरण और कंक्रीट के जंगलों के कारण इनके प्राकृतिक घर छिन रहे हैं। इस समस्या को दूर करने के लिए यह अनोखा प्रयोग किया जा रहा है। विशेषज्ञों ने मधुमक्खियों के रहने के लिए लकड़ी और कार्डबोर्ड ट्यूब से बने 200 कृत्रिम श्मधुमक्खी होटल्य स्थापित किए और तीन साल तक उनकी निगरानी भी की। इस दौरान करीब 600 बार होटलों की जांच की गई, जिसमें 27 हजार से अधिक नए कीट दर्ज किए गए। विशेषज्ञों को उम्मीद थी कि यहां सिर्फ देसी मधुमक्खियां मिलेंगी, लेकिन यह होटल एक पूरा छोटा इकोसिस्टम बन चुके थे। उनका कहना है कि इस प्रयोग ने हमें प्रकृति का एक नया नियम सिखाया है। क्योंकि श्बी-होटल्य पर्यावरण को नुकसान नहीं पहुंचाते।
(प्रस्तुतिः- रवि कुमार बिश्नोई संपादक दैनिक केसर खुशबू टाइम्स मेरठ)
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