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    हिन्दी पत्रकारिता दिवस : संगठन और संबंधों की शक्ति को पहचान सम्मान और गौरव बनाए, मीडिया की संख्या और ताकत बढ़ रही है, कमजोर क्यों हो रहे हैं हम

    adminBy adminMay 30, 2026No Comments2 Views
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    दोस्तों आज बड़ा ही शुभ दिन है क्योंकि 30 मई 1826 को पंडित जुगल किशोर शुक्ल द्वारा शुरू किए गए पहले हिन्दी अखबार उदन्त मार्तण्ड का स्थापना दिवस कह ले या जन्मदिन अथवा जो भी हो आज हम उसकी एक प्रकार से वर्षगांठ मना रहे हैं। और आज ही देश के यशस्वी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की केंद्र में सरकार के 1२ साल पूरे हो रहे हैं। भाईयों एक बच्चा जब मां के पेट में नौ माह रहता है तो सारा परिवार उसको स्वस्थ रखने के लिए हर उपाय करता है। लेकिन मैं यह तो नहीं कहता कि इसके लिए दोषी कौन हैं मगर पिछले नौ वर्षों में देशभर में प्रकाशित कुछ समाचार पत्रों को छोड़कर लघु और भाषाई समाचार पत्र संचालकों के समक्ष जो आर्थिक और अपनी साख तथा विश्वसनीयता व व्यवसाय को बचाने के लिए जो संकट उत्पन्न हुए हैं उन्हें कोई भी भूला नहीं है। केंद्र व प्रदेश के सूचना मंत्री जाने अनजाने में ही डीएवीपी आरएनआई और सूचना विभाग की आड़ लेकर जो उत्पीड़न करा रहे हैं वो किसी से छिपा नहीं है।
    आज की तारीख में हम हवा से भी ज्यादा तेज दौड़ने की कोशिश सोशल मीडिया के माध्यम से और अपनी विश्वसनीयता प्रिंट मीडिया के प्रयासों से कायम करने में सफल हैं तो उसी का परिणाम है कि आज अपने देश के ही नहीं दुनियाभर के बड़े बड़े शहरों से लेकर गांव देहातों और कस्बों में पत्रकारिता में रूचि रखने वाले छात्रों व युवाओं की संख्या दिन प्रतिदिन बढ़ रही है। पहले परंपरागत मीडिया और फिर प्रिंट मीडिया जब अपने पूरे जोश से काम कर रहा था तो हमें समाचार पत्र संचालकों और संवाददाताओं को हर जगह सम्मान तो मिलता ही था नेता अफसर से लेकर सरकारें तक मीडिया नाराज ना हो जाए इसका ध्यान झ रखते थे। और मैंने तो वो जमाना भी देखा है जब मैंने साप्ताहिक औघड़नाथ से अपना पहला समाचार पत्र प्रकाशित किया तो किस तरह से हमारे कहने पर एकदम तमाम काम जनता के हो जाते थे। लेकिन आज हमारी ताकत और रफ्तार दोनों बढ़ रही है। फिर भी हम क्यों पीछे रहे हैं सोचना होगा।
    हिन्दी पत्रकारिता की सत्यता
    क्योंकि पूर्व में समाचार दूर भेजने के लिए बड़ा समय लगता था इसलिए छप भी जाता था तो उसका प्रचार इतनी तेजी से नहीं हो पाता था जितना इलैक्ट्रॉनिक और सोशल मीडिया के आ जाने से होने लगा। हिन्दी पत्रकारिता की सत्यता और निष्ठा तथा विश्वास कभी समाप्त नहीं हो सकता। और अन्य मीडिया जो प्रचलन में है। उनकी प्रचार शक्ति और तेजी में भी बढ़ोत्तरी होगी यह बात भी विश्वास से कही जा सकती है।
    बड़े छोटे का भेदभाव भूलें
    अगर हम चाहते हैं कि पुराने समय की भांति जिसको लेकर हमेशा जब भी हम जुटते हैं चर्चा होती है वो व्यवस्था हम चाहते हैं तो हमें कुछ प्रयास भी करने होंगे। जिसके तहत समाचार पत्र साप्ताहिक हो या दैनिक उससे जुड़ा पत्रकार चाहे कोई भी हो हम सबको संगठित होकर बड़े छोटे का भेदभाव भूल सहयोग की भावना से एक परिवार के रूप में काम करना होगा।
    फर्जी पत्रकार कैसे तय हो
    हमेशा जहां चार पत्रकार खड़े हुए नहीं कि वहां फर्जी पत्रकार फलां तो ब्लैकमेलर है फलां तो अधिकारियों की चमचागिरी करता है ऐसी बातों को छोड़ यह तय करना होगा कि आखिर कौन फर्जी है। क्योंकि जब तक यह सुनिश्चित नहीं हो जाता तब तक किसी को कुछ भी कहना उचित नहीं। जहां तक मेरा विचार है। वहां तक चाहे कोई त्रैमासिक निकालता हो या मासिक पत्रिका अथवा साप्ताहिक पाक्षिक या दैनिक जो भी प्रकाशित करता हो वो पत्रकार है उसे कोई भी फर्जी नहीं कह सकता क्योंकि मीडिया की ताकत 20 पन्नों के अखबार या सोशल मीडिया अथवा इलैक्ट्रोनिक की रफ्तार से नहीं बनती। पत्रकार की पहचान उसके समाचाारों व उठाई गई समस्याओं त निर्भीकता के साथ दूसरों को बुरा ना लगे और हम अपनी बात कह जाए की नीति पर चलकर अपने कार्य को निष्ठा के साथ पूरा करना होगा। तभी हम सब अपना पुराना मान सम्मान प्राप्त कर सकते हैं। परंपरागत मीडिया प्रिंट आया और फिर अन्य तकनीकियां आई सबका अपना अपना वजूद है। ना कोई समाप्त हुआ है ना होगा। बस काम करने का तरीका थोड़ा बदल सकता है।
    सुख सुविधा जुटाने में लगे हैं
    समाज में जो बदलाव आए हैं और जिस प्रकार से चाहे अफसर हो या नेता अथवा कोई और सुविधाएं जुटाने और बैंक बैलेंस बढ़ाने की जो भावना पैदा हुई है उससे हम भी बचे नहीं है क्योंकि हम भी समाज का ही अंग है इसलिए किसी को भी ब्लैकमेलर अथवा पीत पत्रकारिता करने वाला कहने से बचना होगा क्योंकि समाज के हर क्षेत्र में किसी ना किसी रूप में ऐसे ही लोगों का बोलबाला है। इसलिए वर्तमान व्यवस्था के चलते अगर कोई सोचे कि मिशनरी पत्रकारिता करके वो अपना या किसी और का भला कर सकता है तो वो उसकी कोरी कल्पना ही हो सकती है।
    आर्थिक अपराधियों का महिमामंडन
    समाज में यह किसी से छिपा नहीं है कि भूमाफिया अवैध निर्माणकर्ता शिक्षा माफिया और आर्थिक अपराधी तथा सफेदपोश मुंख में राम बगल में छुरी तथा भेड़ की खाल में छिपे सियार की कहावत पर सही उतरने वाले व्यक्तियों के द्वारा अपनी काली कमाई के दम पर जो चक्रव्यूह रचा गया है उससे नौकरशाह और समाज का उत्थान की बात करने वाले भी बचने नहीं है तो फिर पत्रकार भी मानव है। और उसमें भी सोचने की ताकत है। तो वो भी इनसे आसानी से बच नहीं पाता है। लेकिन सिर्फ इतना कहना चाहता हूं कि जैसा माहौल और देश वाली कहावत पर चलते हुए समयानुसार हमें काम करना है लेकिन देश का नुकसान ना हो और हमारे कार्य से कोई व्यक्ति पीड़ित न हो इस बात को ध्यान रखते हुए हमें सबकुछ करना चाहिए लेकिन सफेदपोश और आर्थिक अपराधियों को जिस प्रकार से ताकतवर लोग सपोर्ट कर रहे है। उसमें सहयोगी नहीं बनना चाहिए।
    राजा हरिश्चंद्र
    बस हमें उनकी झूठी प्रशंसा और मक्कारीपूर्ण कार्यों को महिमामंडन करने से बचने की आवश्यकता है। जहां तक सवाल उठा सकते हैं उठाएं लेकिन अपने काम को अपने परिवार स्वयं और व्यवसाय के हित में निर्णय ले। क्योंकि इस समय में हमारा राजा हरिश्चंद्र बनकर जिंदा रहना मुश्किल है।
    राम चंद्र कह गए सिया से
    दिलीप कुमार सायरा बानों की एक हिन्दी फिल्म गोपी के गाने रामचंद्र कह गए सिया से ऐसा कलयुग आएगा हंस चुगेगा दाना तिनका कौवा मोती खाएगा को ध्यान में रखकर सोंचे तो इस क्षेत्र में मुझ जैसे लोग सक्रिय हुए हैं। इसी कारण से भी हम लोगों में तालमेल की कमी नजर आती है लेकिन लोकतंत्र में सबको अपनी बात कहने और कार्य करने का अधिकार है। और यह कहीं नहीं लिखा कि अंगुठा टेक अनपढ़ व्यक्ति पत्रकारिता नहीं कर सकता। इसलिए हम सबको मिलकर अब मुददो की लड़ाई लड़नी होगी। क्योंकि इस क्षेत्र में अपात्र व अपराधी समझे जाने वाले कुछ लोग सक्रिय हो रहे हैं हैं और यह भी दिखाई दे रहा है कि उनमें से कुछ सफल भी है इसलिए फालतू की बातें सोचकर अपना कद और व्यवस्था समाप्त करने की बजाय इस क्षेत्र में सक्रिय बुजुर्गों को रिश्ते की डोर में पिरोकर एक माला की भांति संगठित होकर काम करें तो अभी हम हर क्षेत्र में अपनी सफलता के झंडे गाड़ने के साथ साथ पुरानी परिस्थितियों में अपनी पहचान खड़ी कर सकते हैं।
    अपने अधिकार व सुविधा लेने हेतु
    पत्रकार साथियो हमारी सबकी समस्याएं अलग अलग हो सकती है लेकिन उददेश्य बिल्कुल एक है इसलिए अपनी समस्या का हल करने के साथ साथ दूसरे का समाधान भी खोजें और जब भी मौका मिले उन लोगों को अपनी बात जरूर बताएं जो कुछ करने की स्थिति में है। हम सबको मिलकर पूर्व में जिस तरह सरकार द्वारा छोटे बड़े सभी समाचार पत्रों को विज्ञापन दिए जाते थे उसका वितरण शुरू शुरू कराने ईमानदारी से अपने काम को अंजाम दे रहे पत्रकारों को पत्रकार मान्यता शासन द्वारा सरलता से दिए जाने अन्य प्रकार के जो बीमे व अन्य सुविधाएं देने की नीति सरकार ने बनाई है वो सबको मिले। इसके लिए प्रयास भी करने होंगे।
    गांधीवादी तरीके से रखनी होगी बात
    कोरोना काल में जो हमारे भाई बंधु हमसे बिछड़ गए उनके परिवारों को मिलने वाली सुविधाएं उपलब्ध हो और अपने आपको श्रेष्ठ समझने वाले नौकरशाह सरकारी बाबू पूर्व की भांति हमें सम्मान दें।
    इसके लिए हमें संगठित प्रयास करने हैं। पिछले दो तीन साल हमारे क्षेत्र के लोगों पर काफी भारी रहे क्योंकि सुविधाएं थी नहीं। समाचार संकलन हर हाल में करना था। शुरू में सरकार हमें अग्रिम पक्ति में रखने को भी तैयार नहीं थी लेकिन फिर भी हमने अपने कर्तव्यों का निर्वहन किया।
    हमारे कई भाई हमसे बिछड़ गए उन्हें श्रद्धांजलि देते हुए मैं आप सब लोगों से विनम्र अनुरोध करता हूं कि मुठठी जब तक बंद है तब तक ताकत बनी रहती है। संगठन ही शक्ति है को आत्मसात कर हम सब एक हो जाओं और हमारे अधिकारों पर कुठाराघात करने वालों को ऐसा न करने के लिए गांधीवादी तरीके से कर दें मजबूर।
    जनप्रतिनिधि सोंचें नहीं तो
    दोस्तों डीएवीपी और आरएनआई व सूचना विभाग के अधिकारी व जनप्रतिनिधि हमें कुछ देने को तो तैयार नहीं है लेकिन हमारा उत्पीड़न करने का कोई भी मौका नहीं चूक रहे है। हमारे केंद्रीय सूचना प्रसारण मंत्री व अन्य जनप्रतिनिधि इस ओर ध्यान नहीं दे रहे इसलिए इनके हौंसले बढ़ते ही जा रहे है जिसका हमें शांतिपूर्ण तरीके से एकजुट होकर विरोध करने के साथ ही जनप्रतिनिधियों को असलियत से अवगत कराना चाहिए।
    ताउ चाचा भाई भतीजे
    इस कठिन दौर से अगर हमें सुरक्षित होकर आगे बढ़ना है। अपनी गरिमा और गौरव कायम रखते हुए बड़े समाचार पत्र संचालकों को ताउ चाचा और पत्रकारों को बेटा और भतीजा जैसे रिश्तों में जुड़कर आगे बढ़ते हुए एक दूसरे की आलोचना करने के बजाय कंधे से कंधा मिलाकर वकालत करनी है।
    संगठन में शक्ति
    और अपने अधिकारों की प्राप्ति हेतु जो धीरे धीरे कारण कुछ भी हो हमसे छीने जा रहे हैं उनको बनाए रखने के लिए यह जरूरी है कि एक सूत्र में बंधकर आगे बढ़े और कहते हैं कि संगठन में शक्ति है। यही मूलमंत्र अपनाते हुए हमें आगे बढ़ना है। बिना यह सोचे कि कौन छोटा है कौन बड़ा। सब जानते हैं कि बिना मांगे तो मां भी दूध नहीं पिलाती है। रोटी हजम हो जाए इसलिए उसे चबाना पड़ता है। इस तथ्य को ध्यान रखते हुए अपनी समस्याओं का लेख और ज्ञापन बनाकर प्रधानमंत्री, सूचना मंत्रियों, मुख्यमंत्रियों और अफसरों को मेल वॉट्सऐप आदि के माध्यम से निरंतर भेजने होगे जिससे जिम्मेदारों के कानों में हमारी आवाज गूंजती रहे और एक दिन मजबूर होकर हमें सम्मान देने के लिए आगे आना पड़े।
    प्रस्तुति:- अंकित बिश्नोई मजीठियां बोर्ड यूपी के पूर्व सदस्य सोशल मीडिया एसोसिएशन एसएमए के राष्ट्रीय महामंत्री, संपादक व पत्रकार

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