नई दिल्ली 31 जुलाई। सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को चीफ इलेक्शन कमिश्नर और इलेक्शन कमिश्नरों के चुनाव के तरीके पर केंद्र सरकार से कई तीखे सवाल पूछे। कोर्ट ने कहा कि इलेक्शन कमीशन को सिर्फ इंडिपेंडेंट होकर काम नहीं करना चाहिए, बल्कि उसे इंडिपेंडेंट दिखना भी चाहिए।
जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की बेंच ने पूछा कि जब CBI डायरेक्टर और लोकपाल के सिलेक्शन में CJI को रखा जाता है, तो CEC और EC जैसे सबसे अहम पदों के लिए CJI को पैनल से बाहर क्यों रखा गया।
जस्टिस दीपांकर दत्ता और सतीश चंद्र शर्मा की बेंच ने कहा कि CJI CBI डायरेक्टर और लोकपाल के लिए सिलेक्शन पैनल का हिस्सा थे, और पूछा कि उन्हें CEC और ECs के पदों को चुनने के प्रोसेस से बाहर रखने का क्या कारण हो सकता है, जो डेमोक्रेसी के लिए सबसे जरूरी पदों में से हैं। कोर्ट ने केंद्र की इस अर्जी पर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया कि मामले को कॉन्स्टिट्यूशन बेंच को भेजा जाए।
कोर्ट ने कहा, यह भरोसे की कमी नहीं है। लेकिन निष्पक्षता दिखनी भी चाहिए। जैसे इंसाफ सिर्फ किया नहीं जाता, उसे होते हुए दिखाना भी होता है।
2023 का कानून क्या है?
2023 में SC की 5 जजों की बेंच ने कहा था कि जब तक संसद कानून नहीं बनाती, तब तक CEC-EC की नियुक्ति PM, CJI, विपक्ष के नेता वाले पैनल से होगी। इसके बाद संसद ने 2023 का कानून पास किया। इसमें CJI की जगह PM द्वारा चुना गया एक कैबिनेट मंत्री को रख दिया गया। अब पैनल में 3 लोग हैं, PM, विपक्ष के नेता और PM के चुने हुए मंत्री। इसी कानून की वैधता को कोर्ट में चुनौती दी गई है।
सरकार ने दी दलील
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि कोर्ट ये मानकर नहीं चल सकता कि PM गलत काम करेंगे। PM के पद की एक पवित्रता है। लोगों को PM पर भरोसा करना चाहिए। अगर कैबिनेट चुनने में सलाह नहीं चाहिए, तो CEC चुनने में क्यों। अटॉर्नी जनरल आर वेंकटरमणी ने कहा कि संसद की पसंद पर सवाल नहीं उठाया जा सकता। संसद का मुंह बंद नहीं किया जा सकता।
सरकार ने मांग की कि इस मामले को बड़ी कॉन्स्टिट्यूशन बेंच को भेजा जाए।
सीनियर वकील प्रशांत भूषण, गोपाल शंकरनारायणन और अन्य ने सरकार की मांग का विरोध किया। उन्होंने कहा कि 20 दिन की सुनवाई के बाद सरकार ये मांग कर रही है। सुनवाई के बाद कोर्ट ने अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है। अब तय होगा कि मामला बड़ी बेंच को जाएगा या नहीं।

