हमारी सरकारें शहरों और गांवों आदिवासी क्षेत्रों तक सड़कों का जाल बिछाने की बात करती रही है मगर यह देखकर अफसोस होता है कि आज भी बीमारों को लेकर अस्पतालों तक जाने के लिए ग्रामीणों को समस्याओं का सामना करना पड़ा। यूपी के एक गांव में बीमार को लेकर कई किमी तक पैदल लेकर जाना पड़े। नई घटना आंध्र प्रदेश के पार्वतीपुरम मन्यम जिले में स्कूल वार्डन मानसून में इलाज की सुविधा ना होने पर एक बच्ची को अपनी पीठ पर लादकर पथरीले रास्तों से होते हुए अस्पताल पहुंचाया। घटना के अनुसार आंध्र प्रदेश के पार्वतीपुरम मन्यम जिले में आदिवासी कल्याण स्कूल की वार्डन ने मॉनसून के मौसम में पथरीले और ऊबड़-खाबड़ जंगली रास्ते से गुजरते हुए, अपनी जान जोखिम में डालकर एक गंभीर रूप से बीमार छात्रा को अपनी पीठ पर उठाया और समय पर इलाज के लिए अस्पताल पहुंचाया। यह घटना 30 जून को हुई थी, लेकिन गुरुवार को बचाव कार्य का वीडियो वायरल होने के बाद मामला सबके सामने आया।
गुम्मलक्ष्मीपुरम के भद्रागिरी आदिवासी कल्याण गर्ल्स आश्रम स्कूल की 7वीं कक्षा की 11 वर्षीय छात्रा भुवनेश्वरी छुट्टियों में अपने गांव वडापुट्टी गई थी। पिता की मौत के बाद अपने चाचा के साथ रह रही इस बच्ची को पेट में तेज दर्द, उल्टी और तेज बुखार की शिकायत हुई।
परिवार वाले उसे पहले कुरुपम के सरकारी अस्पताल ले गए, लेकिन घर लौटने पर उसकी हालत फिर बिगड़ गई। दूर-दराज के आदिवासी गांव तक पहुंचने के लिए कोई पक्की सड़क या परिवहन सुविधा न होने के कारण, परिवार ने स्कूल प्रशासन को सूचना दी।
तुरंत कार्रवाई करते हुए, स्कूल की वार्डन हेमानी गांव पहुंचीं। यह समझते हुए कि बच्ची की बिगड़ती हालत को देखते हुए हर मिनट कीमती है, उन्होंने एम्बुलेंस या किसी अन्य मदद का इंतजार नहीं किया। उन्होंने बेहद कमजोर हालत में पड़ी बच्ची को कपड़े से अपनी पीठ पर कसकर बांधा और लगभग तीन किलोमीटर लंबे पथरीले, ऊबड़-खाबड़ जंगली रास्ते पर चलना शुरू कर दिया।
इस मुश्किल रास्ते पर छात्रा के माता-पिता भी उनके साथ चले और वे नेल्लिकेककुवा गांव पहुंचे, जहां एक गाड़ी इंतजार कर रही थी। वहां से वे भुवनेश्वरी को पार्वतीपुरम के सरकारी जिला अस्पताल ले गए। छात्रा की हालत गंभीर होने के कारण उसे तुरंत इंटेंसिव केयर यूनिट में भर्ती कराया गया। जि़ला चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी डॉ. भास्कर राव ने कहा कि वरिष्ठ स्वास्थ्य अधिकारियों ने अस्पताल का दौरा किया और पुष्टि की कि भुवनेश्वरी डॉक्टरों की देखरेख में ठीक हो रही है।
वार्डन की तारीफ होने पर विनम्रता से हेमानी ने कहा कि मैं बस अपनी छात्रा की जान बचाना चाहती थी। ऐसी स्थितियों में हम मुश्किलों के बारे में नहीं सोच सकते। बच्चे की जान सबसे पहले आती है। उनके इस असाधारण काम ने कई लोगों का दिल जीत लिया। महिला, बाल कल्याण और आदिवासी कल्याण मंत्री गुम्माडी संध्यारानी ने हेमानी को शॉल भेंटकर सम्मानित किया और उनके समर्पण की सराहना की। मंत्री ने कहा कि हेमानी ने अपनी ड्यूटी से कहीं आगे बढ़कर काम किया। सड़क संपर्क न होने के बावजूद बच्चे का इलाज सुनिश्चित करके उन्होंने दिखाया कि सच्ची जनसेवा क्या होती है। उनका समर्पण सभी के लिए प्रेरणा है।
खबर के अनुसार बच्ची ठीक हो रही है मगर उसे अस्पताल तक ले जाने में जो समस्याएं वार्डन को हुई या जो सुविधा बच्ची को मिली वो सबको मिल जाएगी यह पक्का नहीं है। मेरा मानना है कि दावों के हिसाब से पक्ष विपक्ष के लोगों को मिलकर अपने क्षेत्रों में सरकारी अस्पतालों के निर्माण व रास्ते बनवाने के लिए गांधीवादी तरीके से मांग की जानी चाहिए। खुशहाली तभी आती है जब आने जाने का मार्ग हो और चिकित्सा सुविधा मिल जा एं। वैसे भी यह आवश्यक है इसलिए मुझे लगता है महाराष्ट्र और आंध्र प्रदेश की सरकारों को केंद्रीय स्वास्थ्य और सड़क परिवहन मंत्री से मिलकर आदिवासी गांव सहित सभी गांवों तक चिकित्सा शिक्षा और सड़कों की व्यवस्था कराने के प्रयास करने चाहिए।
(प्रस्तुतिः- रवि कुमार बिश्नोई संपादक दैनिक केसर खुशबू टाइम्स मेरठ)
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