नई दिल्ली, 25 जून (ता)। ईरान जंग के खिलाफ राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को अमरीकी सेनेट ने तगड़ा झटका दिया है। रिपब्लिकन पार्टी के नियंत्रण वाली अमरीकी सेनेट ने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के विरोध के बावजूद बड़ा कदम उठाते हुए उस प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है, जिसमें मांग की गई है कि राष्ट्रपति ईरान में युद्ध रोकें या सैन्य कार्रवाई जारी रखने से पहले संसद (कांग्रेस) की मंजूरी लें। रिपोर्ट के अनुसार, इस महीने की शुरुआत में अमरीकी प्रतिनिधि सभा में भी इस प्रस्ताव को पारित किया जा चुका है। वर्ष 1973 के ‘वार पावर्स रिजॉल्यूशन’ के लागू होने के बाद अमरीकी इतिहास में यह पहली बार है, जब संसद के दोनों सदनों ने किसी राष्ट्रपति को सैन्य कार्रवाई समाप्त करने का निर्देश देने वाला कोई संयुक्त प्रस्ताव पारित किया है। गौरतलब है कि यह एक ‘समानवर्ती प्रस्ताव’ है। इसका मतलब है कि यह केवल संसद की भावना या इच्छा व्यक्त करता है। कानूनी रूप से बाध्यकारी न होने के कारण इसे राष्ट्रपति ट्रंप के पास उनके हस्ताक्षर या विचार के लिए नहीं भेजा जायेगा। सेनेट में हुए 50-48 के इस ऐतिहासिक मतदान में रैंड पॉल, लिसा मुर्काेव्स्की, सुसान कोलिन्स और बिल कैसिडी जैसे चार रिपब्लिकन सांसद अपनी ही पार्टी के राष्ट्रपति के खिलाफ जाकर डेमोक्रेटों के साथ शामिल हो गए।
वहीं, दूसरी तरफ डेमोक्रेटिक पार्टी के सेनेटर जॉन फेटरमैन अपनी पार्टी के अकेले ऐसे सदस्य रहे जिन्होंने इस प्रस्ताव के विरोध में वोट डाला। व्हाइट हाउस के एक अधिकारी के अनुसार, यह प्रस्ताव केवल इसलिए पारित हो सका, क्योंकि मिच मैककोनेल और डेव मैकोर्मिक जैसे दो दिग्गज रिपब्लिकन सेनेटर मतदान के दौरान अनुपस्थित थे। उधर, राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘ट्रूथ सोशल’ पर इस मतदान की कड़े शब्दों में निंदा की। उन्होंने इसे गलत समय पर लिया गया एक बेमतलब फैसला बताया। ट्रंप ने लिखा कि जब मैंने ईरान को पूरी तरह घुटनों पर ला दिया है और वह घुटने टेकने ही वाला है३ ठीक उसी वक्त अमरीकी सेनेट ने गलत समय पर युद्ध शक्ति कानून को लेकर यह अर्थहीन मतदान करा दिया। इन सांसदों ने मेरा काम और ज्यादा मुश्किल कर दिया है, लेकिन मैं इसे किसी न किसी तरह पूरा कर ही दम लूंगा, क्योंकि मैं अपना काम हमेशा पूरा करता हूं!
ईरान की संसद के स्पीकर मोहम्मद बाघेर गालिबाफ ने गत दिवस कहा कि अमरीका के साथ हुआ इस्लामाबाद समझौता आखिरकार अमरीका की हार का ऐलान बन गया। अजरबैजान में इस्लामिक देशों की संसदों की बैठक में शामिल गालीबाफ ने कहा कि इस समझौते ने साबित किया है कि बातचीत तभी सफल हो सकती है, जब दूसरा पक्ष अपनी शर्तें थोपने की कोशिश बंद करे और ईरान के अधिकारों को स्वीकार करे। गालिबाफ ने कहा कि यह एमओयू किसी दबाव या मजबूरी का नतीजा नहीं था, बल्कि ईरान के प्रतिरोध और ताकत का परिणाम था।
पाकिस्तान ने कहा है कि अमरीका और ईरान के बीच तकनीकी स्तर की वार्ता अगले हफ्ते फिर शुरू होगी। पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ताहिर अंद्राबी ने इस्लामाबाद में कहा कि मेरा अनुमान है कि बातचीत अगले हफ्ते मंगलवार (30 जून) से फिर शुरू होगी। हालांकि, सोमवार या बुधवार भी संभावित तारीखें हो सकती हैं।
अमरीकी विदेश मंत्री मार्काे रुबियो ने कहा है कि अमरीका किसी भी अंतिम समझौते के तहत ईरान को होर्मुज स्ट्रेट से गुजरने वाले जहाजों से टोल वसूलने की इजाजत नहीं देगा। यूएई के दौरे के दौरान उन्होंने कहा कि यह एक अंतरराष्ट्रीय जलमार्ग है। किसी भी देश को अंतरराष्ट्रीय समुद्री रास्ते पर टोल या शुल्क वसूलने की इजाजत नहीं है। मुझे भरोसा है कि क्षेत्र के अन्य देश भी इस बात से सहमत होंगे।
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