अव्यवस्थित यातायात और अप्रशिक्षित ट्रैफिक की ट्रेनिंग के चलते कहीं ज्यादा कहीं कम ट्रैफिक व्यवस्था आम नागरिकों के लिए परेशानी का कारण बन रही है, इस बात से कोई भी इनकार नहीं कर सकता। दूसरी तरफ ये भी सही है कि सिर्फ चालान काटने या वाहन वालों को धमकाने या जोर से बोलने कि हम तो बारिश धूप और ठंड में डयूटी कर रहे हैं और आप सहयोग नहीं कर रहे कहने से अथवा 40-50 पुलिसकर्मी एक साथ सड़क पर निकल जाएं और सामान हटाओ अतिक्रमण तोड़ो कहने से समस्या का समाधान नहीं निकलने वाला। ऐसे प्रयासों से लगने वाली भीड़ से आवागमन और मुश्किल हो जाता है और नागरिकों की परेशानी बढ़ती है। कुछ लोगों का यह कहना सही है कि यातायात पुलिस के सिपाहियों को प्रशिक्षण देने और नागरिकों से सही व्यवहार की ट्रेनिंग भी दी जानी चाहिए तथा चालान काटने और यातायात संभालने वाले कर्मियों की अलग अलग व्यवस्था की जाए। कुछ चापलूसों की सुनने की बजाय दिनभर सड़क पर काम से बाहर रहने वाले व्यापारियों और नागरिकों से चर्चा कर फैसले लिए जाएं तो कई परेशानी का हल सामने आ सकता है क्येांकि जब कट बंद करने के नाम पर जो अव्यावहारिक निर्णय लिए जाते हैं वो काफी मानसिक परेशानी और हादसों को न्यौता देते नजर आते हैं। क्येांकि कुछ अफसर जो बंद कमरों में बैठकर फैसला करते हैं आम आदमी के सामने आने वाली समस्याएं उससे अलग होती है।
सही प्रकार से जनसहयोग से तैयार ट्रैफिक प्लान लागू करने के लिए जरूरी है कि जो सुविधाएं नागरिकों को यातायात की सुविधाएं मिलनी चाहिए वो मिले और केंद्रीय सड़क परिवहन मंत्री नितिन गडकरी और यूपी के सीएम योगी द्वारा जो गडढामुक्त सड़कों के आहान के तहत सड़कों में सुधार हो तभी कुछ सही हो सकता है। वरना इधर उधन खड़े होकर मोबाइल से फोटो खींचना और चालान कर भेज देना और कई मौकों पर सौदेबाजी के चलते यह व्यवस्था सुधरने वाली नहीं है क्योंकि जिन चौराहों पर नियम विरूद्ध वाहनों पर कार्रवाई के लिए यातायात पुलिसकर्मी तैनात किए जाते हैं वो बाइक और दूसरे राज्यों के वाहनों के चालान कर अपना हित साधने की कोशिश ज्यादा करते नजर आते हैं और ऐसा ना करने पर नागरिकों कों परेशान किया जाता है लेकिन इनके सामने से जुगाड़ वाहनों पर नियम विरूद्ध माल ढोया जाता है। टेंपों जहरीला धुंआ छोड़ते हैं। लेकिन इन्हें ज्यादातर मौकों पर यातायात पुलिस रोकने की कोशिश नहीं करते। इनका कहना होता है कि गरीब आदमी को परेशान क्यों करें तो फिर आम आदमी का क्या कसूर है। और संविधान में सबको बराबर अधिकार दिए गए हैं। पूर्व में अदालत का आदेश भी आया था कि गरीब होना नियमों के उल्लंघन की छूट नहीं हैं अभी कुछ दिन पूर्व एक न्यायाधीश ने टिप्पणी की कि जब सुविधाएं नहीं है तो टोल क्यों वसूला जा रहा है। इसे ध्यान रख कहा जा सकता है कि नागरिकों को जो सुविधाएं मिलनी चाहिए वो नहीं मिल रही। वहीं जो अधिकारी चालान काटने के लिए अधिकृत है। उनके स्थान पर सिपाहियों द्वारा चालान काटना सही नहीं है।
एक बुजुर्ग नागरिकों का यह कहना सही लगता है कि आज जो आए दिन नागरिकों द्वारा जो कभी कभी पुलिस के खिलाफ क्षोभ व्यक्त किया जाता है वो कुछ पुलिसकर्मियों की कार्यप्रणाली को देखकर किया जाता है। कुल मिलाकर कहना है कि या तो सुविधाएं दो वरना चालान कराना बंद करो। क्योंकि ऐसा ना होना भी कभी कभी विवाद का कारण बन जाता है जिससे कानून व्यवस्था प्रभावित होती है और नागरिक समय से पूरा काम ना होने के चलते परेशान रहते हैं। एक खबर के अनुसार प्रदेश की बदहाल यातायात व्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए डीजीपी मुख्यालय ने यातायात निदेशालय को नागरिक पुलिस से 5000 कर्मी आवंटित किए हैं, जिन्हें प्रशिक्षण के बाद सभी कमिश्नरेट और जिलों में तैनात किया जाएगा। इनमें 557 महिला पुलिसकर्मी भी शामिल हैं, जिन्हें पहली बार यातायात प्रबंधन का कार्य लिया जाएगा। बता दें कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने बीते दिनों यातायात पुलिस में महिलाओं की अलग विंग बनाने का आदेश दिया था, जिसमें महिला इंस्पेक्टर, सब इंस्पेक्टर और कांस्टेबल को तैनात किया जाना था।
एडीजी यातायात के. सत्यनारायणा द्वारा इस बाबत जारी आदेश के मुताबिक सभी सात पुलिस कमिश्नरेट को 225-225 पुलिसकर्मी दिए जाएंगे। इनमें इंस्पेक्टर, सब इंस्पेक्टर, हेड कांस्टेबल और कांस्टेबल शामिल हैं। हालांकि अभी केवल महिला हेड कांस्टेबल और कांस्टेबल ही यातायात संबंधी कार्य के लिए मिले हैं। नागरिक पुलिस से भेजे गए सभी पुलिसकर्मियों को एक माह का यातायात प्रबंधन का कोर्स करने के बाद तैनात किया जाएगा। वर्तमान में सभी प्रशिक्षण संस्थानों में नवनियुक्त सिपाहियों का आधारभूत प्रशिक्षण संचालित होने की वजह से यातायात संबंधी प्रशिक्षण कमिश्नरेट और जोन स्तर पर स्थान चिन्हित कर कराने का निर्देश दिया गया है।
क्यों है जरूरत
दरअसल, प्रदेश के सभी कमिश्नरेट और जिलों में यातायात व्यवस्था कर्मचारियों की कमी की वजह से बदहाल है। यातायात कर्मियों की अनुपलब्धता की वजह से मुख्य मार्गों पर जाम की स्थिति रहती है। वहीं सड़क दुर्घटनाएं भी बढ़ रही हैं। प्रदेश सरकार ने सड़क दुर्घटनाओं में होने वाली मौतों की संख्या में 50 फीसद की कमी लाने का लक्ष्य निर्धारित किया था, हालांकि इसमें कमी के बजाय बीते छह माह में बढ़ोतरी दर्ज की गई है। यातायात व्यवस्था को सुदृढ़ करने और दुर्घटनाओं पर अंकुश लगाने के लिए नागरिक पुलिस के 5000 कर्मी दिए गए हैं।
लखनऊ जोन को सर्वाधिक कर्मी
बता दें कि लखनऊ जोन को सर्वाधिक 650 कर्मी आवंटित किए गए हैं। इसके बाद गोरखपुर जोन को 500, मेरठ जोन को 475, आगरा को 450, बरेली को 425, वाराणसी को 375, कानपुर को 300 और प्रयागराज को 250 कर्मी दिए गए हैं। वहीं महिला कर्मियों की तैनाती अधिकतर कमिश्नरेट में की गई है।
इतने पुलिसकर्मी होंगे तैनात
60 इंस्पेक्टर
180 सब इंस्पेक्टर
1264 हेड कांस्टेबल (पुरुष)
168 हेड कांस्टेबल (महिला)
2939 कांस्टेबल (पुरुष)
389 कांस्टेबल (महिला)
इसी प्रकार बताया जा रहा है कि मेरठ में भी 150 यातायात कर्मी मिलेंगे। जानकारी अनुसार यातायात पुलिस को एक महीने बाद 150 और कर्मचारी मिलेंगे। ऐेसे में कर्मचारी बढ़ने पर शहर से लेकर देहात तक की ट्रैफिक व्यवस्था दुरुस्त होने की उम्मीद है। मेरठ जोन के सात जिलों को 475 कर्मचारी मिलेंगे। मेरठ जनपद को 150 कर्मचारी मिलेंगे। इनमें एक टीआई, चार टीएसआई, 35 हेडकांस्टेबल, 9 महिला हेडकांस्टेबल, 81 कांस्टेबल और 20 महिला कांस्टेबल शामिल है। यदि बात मौजूदा कर्मचारियों की करें तो अभी तक टोटल 321 कर्मचारी यातायात पुलिस विभाग में है। इनमें चार टीआई, 47 टीएसआई, 53 हेडकांस्टेबल, 216 कांस्टेबल और एक महिला कांस्टेबल है। एसपी यातायात राघवेंद्र मिश्रा का कहना है कि आवंटित कर्मचारियों को एक माह का प्रशिक्षण दिया जाएगा। उसके बाद उन्हें यातायात पुलिस विभाग में काम की जिम्मेदारी सौंपी जाएगी। 150 कर्मचारियों के बढ़ने से सभी स्थानों पर कर्मचारियों की तैनाती बढ़ जाएगी, ऐसे में यातायात व्यवस्था और सुदृढ़ होगी।
जो प्रयास हो रहे हैं इसे संदर्भ में मैं उन्हें गलत तो नहीं बता रहा हूं लेकिन मेरा मानना है कि यातायात पुलिस पहले तो मेडा के अधिकारियों की मिलीभगत से जो जगह जगह सरकार की निर्माण नीति और मानचित्र के विपरीत हो रहे निर्माणों को रूकवाये और नगर निगम की टीम के माध्यम से अतिक्रमण हटवाएं और अवैध निर्माण व अतिक्रमण के लिए जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई सुनिश्चित कराएं। फिर सड़कों पर फिल्मी स्टाइल में घूमने से पहले बाजार संघों और मोहल्ला कमेटियों के साथ नागरिकों को बुलाया जाए और चर्चा कर निर्णय लेने से पहले सिर्फ स्कूलों के प्रधानाचार्यों को बुलाकर बैठक करने की बजाय अभिभावकों और स्कूलों की प्रबंध समिति के पदाधिकारियों को बुलाकर स्कूलों के छुटटी के समय में अंतर किया जाए क्योंकि एक साथ कई स्कूलों में छुटटी होना जाम का प्रमुख कारण है। ऐसे प्रयास किए जाते हैं तो सीएम की भावना के तहत शहरों का सौंदर्यीकरण और यातायात व्यवस्था बन सकती है। वरना आप कितने डंडे पटकाते और चालान करते रहें उससे कुछ होने वाला नहीं है क्योंकि डर व जुर्माने से सब ठीक हो सकता तो ना एक दूसरे के साथ मारपीट करते और ना ही दुष्कर्म होते क्योंकि इन सबको करने वालों पर मोटा जुर्माना और जेल भेजने की व्यवस्था लागू होती है। मगर फिर भी मीडिया की सुर्खियां ऐसे काम बने रहते है। कहने का मतलब सिर्फ इतना है कि चाहे पांच हजार पुलिसकर्मी व्यवस्था सुधारे या किसी जनपद में 150 व्यवस्था में सुधार जनसहभागिता और अफसरों की कुशल नीति से ही तय हो सकती है।
(प्रस्तुतिः- रवि कुमार बिश्नोई संपादक दैनिक केसर खुशबू टाइम्स मेरठ)
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