देश की अदालतों में मुकदमों की बढ़ती संख्या से आम आदमी तो परेशान है ही माननीय न्यायाधीश और सरकार भी चिंतित है ऐसे में अगर खाप पंचायतों के लिए कुछ नियम कानून निर्धारित कर उन्हें अपने स्थानीय मामले बिना किसी लागलपेट और पक्षपात के निपटाने हेतु बाकायदे उनका रजिस्ट्रेशन कराकर अधिकार दिये जा सकते हैं। इसमें कोई परेशानी मुझे लगता है कि किसी को नहीं होनी चाहिए मगर बिना किसी अधिकार या मान्यता के बने जातिगत मंचों का पदाधिकारी बनकर जो अपनी सीमा से बाहर जाकर फैसले दिये जाते हैं वह सही नहीं है। क्योंकि इनसे कई मामलों में देखने को मिला है कि क्षमा योग्य न होने के बावजूद भी अपराधी को जूते मारने या समाज से बहिष्कार करने अथवा जुर्माना ठोकने की सजा देकर माफ किया जाता है और क्योंकि ज्यादातर का बाद में जानकारों के अनुसार पालन नहीं होता है और कुछ दिनों बाद सभी भूल जाते हैं तो विभिन्न अपराधों को जन्म देने वाले कोई ना कोई कारस्तानी करने का कोई मौका नहीं चूकते इस संदर्भ में राजस्थान जोधपुर की एक अदालत द्वारा दिये गये फैसले के अनुसार गैर-कानूनी सामुदायिक संस्थाओं को कड़ी फटकार लगाते हुए, राजस्थान हाईकोर्ट ने फैसला सुनाया कि स्वयंभू जाति और खाप पंचायतों द्वारा जारी फरमान जिनमें सामाजिक बहिष्कार से लेकर भारी आर्थिक जुर्माने तक शामिल हैं असंवैधानिक हैं और कानून के राज को कमजोर करते हैं।
जस्टिस फरजंद अली की एकल पीठ ने हाल ही में दिए फैसले में इस मुद्दे को एक गंभीर सामाजिक चिंता बताई। एकल पीठ ने राजस्थान सरकार को निर्देश दिया कि वह सामाजिक बहिष्कार की शिकायतों से निपटने के लिए एक स्पष्ट नीति बनाए, जिसे एक मानक संचालन प्रक्रिया (एसओपी) का समर्थन प्राप्त हो। एकल पीठ ने आदेश दिया कि प्रत्येक जिले में श्नोडल अधिकारी्य नियुक्त किए जाएं, जो जिला कलेक्टरों और पुलिस प्रमुखों की संयुक्त देखरेख में काम करते हुए, शिकायतों को संभालें और उनका निवारण सुनिश्चित करें। पीठ 11 याचिकाओं के एक समूह पर सुनवाई कर रही थी, जिनमें सिरोही, बाड़मेर, नागौर, बालोतरा, जालोर और जोधपुर की घटनाओं को उजागर किया गया था।
बिना अधिकार के फैसले देते हैं जातिगत मंच
याचिकाकर्ताओं ने दलील दी कि शिकायतों के बावजूद, अधिकारी अक्सर ऐसी अनौपचारिक संस्थाओं के खिलाफ निर्णायक कार्रवाई करने में विफल रहते हैं। जो बार-बार सामने आ रहे ऐसे मामलों पर संज्ञान लेते हुए, अदालत ने टिप्पणी की कि ये जातिगत मंच एक समानांतर न्यायिक प्रणाली के रूप में काम करते हैं, और बिना किसी वैधानिक अधिकार के बाध्यकारी आदेश जारी करते हैं। वो ठीक नहीं हैं।
हम भी आम आदमी की इस दलील से सहमत है कि किसी भी वाद का निस्तारण जल्द से जल्द हो और इसके लिए या तो अदालतों में जजों की संख्या बढ़ाकर उन्हें हर मामले के निस्तारण के लिए एक समय तय किया जाये मुख्य न्यायाधीश द्वारा अथवा छोटे-छोटे मामलों के निस्तारण हेतु चरित्र और सोच का सत्यापन कराकर सही पाये जाने वाले निष्पक्ष व्यक्तियों को ग्राम पंचायतों की जिम्मेदारी सौंपी जाये। इससे छोटी मारपीट या घटनाओं में उलझकर किसी की भी रोजी-रोटी या समय की बर्बादी ना हो। तथा यह भी निर्देश हों अगर उनके फैसले से कोई संतुष्ट नहीं है तो उसे अदालत का द्वार खटखटाने की पूरी आजादी होगी और न्यायाधीश को लगता है कि फैसला गलत दिया गया है तो पंचायत में मौजूद पंचों की नियुक्ति अवैध घोषित कर दूसरों को मौका दिया जाये लेकिन आम आदमी को जल्द से जल्द फैसला देकर एक अच्छा उदाहरण प्रस्तुत किया जा सकता है। बाकी तो न्याय भी सरकार और सरकार और न्यायालय को ही सोचना और तय करना है कि कब क्या करना चाहिए हमें तो जनमानस की जो इच्छाएं और सोच नजर आती है उसके हिसाब से ही जो बिन्दु यहां रखे गये है वह तय किये गये है।
प्रस्तुतिः- अंकित बिश्नोई मजीठियां बोर्ड यूपी के पूर्व सदस्य सोशल मीडिया एसोसिएशन एसएमए के राष्ट्रीय महामंत्री, संपादक व पत्रकार
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