पूरी दुनिया में अब अन्य दिवसों की भांति पुरूष दिवस मनाने की शुरूआत हुई। बड़े आयोजन ना हो रहे हो लेकिन कहीं ना कहीं पुरूष दिवस मनाए ही जा रहे हैं। जिसने इस दिन की शुरूआत की उसका आभार। जो इसे मना रहे हैं उन्हें बधाई क्योंकि पुरूष दिवस की आवश्यकता अब दुनिया में महसूस की जा रही है और जीवन की आवश्यकता परिवार संचालन के लिए जरूरी होती जा रही है। मैं दुनिया की आधी आबादी महिलाओं के बारे में तो कुछ नहीं कह रहा लेकिन जिस तरह प्रेमी के साथ मिलकर पति को काटकर नीले ड्रम में भरने की घटनाएं सुनाई दे रही है तो पत्नी पीड़ित संगठन भी सक्रिय है जिससे यह कह सकते हैं कि अब पुरूषों के आत्मसम्मान को ठेस पहुंचने के साथ ही जान का जोखिम पैदा होने लगा है। अगर कोई सोच ले तो किसी को भी अपनी सोच को अंजाम देने से रोका नहीं जा सकता उसी प्रकार इस घर में क्या खिचड़ी पक रही है जब तक यह पता ना चले कुछ भी नहीं किया जा सकता। अब ऐसी व्यस्थाएं निरंकुश होती जा रही है। कई बार पतियों की पिटाई प्रताड़ित करने की खबरें पढ़ने सुनने को खूब मिलती है इसलिए मेरा मानना है कि अब समय आ गया है कि सरकारें जिस प्रकार से खेल बीमारियों और अन्य दिवस मनाते हैं अब पुरूष प्रताड़ना रोकने के लिए पुरूष आयोग मनाएं और जिस प्रकार हर साल महापुरूषों की जयंती मनाते हैं उसी प्रकार सरकारी स्तर पर पुरूष दिवस मनाने की व्यवस्था हो। अगर कोई संगठन या आम आदमी ऐसा करते हैं तो उन्हें सरकार से आर्थिक सहायता उपलब्ध हो। क्योंकि गरीब बस्तियों में यह दिवस आर्थिक कारणों से मनाना असंभव ना हो इसलिए सहायता उपलबध कराई जाए और जनहित के अन्य मुददों की जानकारी देने के लिए सरकारी अफसर को भेजना तय किया जाए। आम आदमी जनप्रतिनिधियों को बताएं कि वोट उसे मिलेंगे जो हमारी परेशानियों को दूर करेगा और हमारे आयोजनों में शामिल होगा। पुरूषों की कठिनाईयो को नजरअंदाज करना अब आसान नहीं होगा। अब पुरूषों का उत्पीड़न रूकना चाहिए और पुरूष दिवस को मजाक के दिवस में ना देखकर सकारात्मक रूप से लिया जाए।
(प्रस्तुतिः- रवि कुमार बिश्नोई संपादक दैनिक केसर खुशबू टाइम्स मेरठ)
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