सरकारी नौकरियों में अस्थायी नियुक्तियों की परंपरा खत्म होनी चाहिए सुप्रीम कोर्ट का यह आदेश बिल्कुल सही और समयानुकूल व पात्रों के हित में कहा जा सकता है। इससे संबंध खबर के अनुसार सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि शिक्षा को अस्थायी उपायों से सब्सिडी देने के बजाय उसे सुदृढ़ बनाना समय की जरूरत है। शीर्ष अदालत ने झारखंड सरकार को निर्देश दिया कि वह चार सप्ताह के भीतर राज्य भर में सहायक शिक्षकों और सहायक आचार्यों के कुल रिक्त पदों में से 50 फीसदी पद विशेष रूप से संविदा पर नियुक्त शिक्षकों के लिए अधिसूचित करे। शिक्षकों की कमी को शीघ्रता से दूर करने के लिए सर्व शिक्षा अभियान जैसी सरकारी पहलों के तहत संविदा पर शिक्षकों को निश्चित अवधि के अनुबंधों पर नियुक्त किया जाता है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा, कार्यपालिका के लिए आवधिक प्रदर्शन ऑडिट करने और सार्वजनिक रोजगार में संविदा की व्यवस्था को समाप्त करने का समय आ गया है।
जस्टिस पंकज मित्थल और जस्टिस एसवीएन भट्टी ने कहा, आज की सबसे बड़ी आवश्यकता शिक्षा को मजबूत करना है, विशेषकर प्राथमिक और माध्यमिक स्तर पर, न कि उसे अस्थायी उपायों से आर्थिक सहायता देना। शिक्षा प्रदान करना ही उद्देश्य नहीं है, बल्कि व्यापक और उच्च गुणवत्ता वाली शिक्षा प्रदान करना है। पीठ ने कहा, किसी भी सेवा में दक्षता बढ़ाने के लिए रोजगार की सुरक्षा का भाव अत्यंत आवश्यक है, और शिक्षा भी इससे अछूती नहीं है। शिक्षक-छात्र का रिश्ता अस्थायी नहीं होता, बल्कि शैक्षणिक वर्षों तक कायम रहता है। रोजगार की गारंटी के बिना संविदा शिक्षक से बच्चे के भविष्य और शिक्षा की गारंटी की अपेक्षा करना निराधार है।
मुझे लगता है सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय सभी प्रदेशों में लागू हो जिससे पात्र युवाओं को नौकरी मिलेगी और पक्षपात और भाई भतीजा वाद की प्रथा समाप्त होगी और आए दिन ऐसे मामलों में आरोप प्रत्यरोप भी खत्म होंगे क्योंकि नियमानुसार नियुक्ति से हर क्षेत्र में सुधार आने से इनकार नहीं किया जा सकता।
(प्रस्तुतिः- रवि कुमार बिश्नोई संपादक दैनिक केसर खुशबू टाइम्स मेरठ)
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