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    नाम कमाने राजनीतिक फायदे उठाने और पैसा बनाने का माध्यम बनती जनहित याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट का निर्णय है समयानुकुल, इससे अदालतों में वादों की संख्या कम होगी, पात्रों को जल्दी न्याय मिल पाएगा

    adminBy adminMay 6, 2026No Comments11 Views
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    केरल के सबरीमाला मंदिर के संदर्भ में यंग इंडिया लॉयर द्वारा दाखिल जनहित याचिका पर सुप्रीम कोर्ट की नौ जजों की पीठ द्वारा कहे गए शब्द की जनहित याचिका अब धन हित याचिका पब्लिक सिटी और राजनीति से प्रेरित हो गई है। दिल्ली से प्रकाशित पंजाब केसरी के पहले पेज पर प्रकाशित उक्त खबर को पढ़कर आज नागरिकों में राय सुनने को मिली उससे यह लगा कि इस फैसले से सब खुश हैं। कई का कहना था कि जनहित याचिका और सूचना का अधिकार कमजोर जरुरतमंद और पीड़ित व्यक्ति को न्याय दिलाने के लिए दाखिल किए जाने की शुरुआत हुई थी। कई लोग तो उस उददेश्य के तहत काम भी कर रहे हैं लेकिन कुछ लोग वाकई सुप्रीम कोर्ट के कहे शब्दों पर बिल्कुल सही उतरते हैं। कोई आधिकारिक साक्ष्य नहीं है लेकिन सुना जाता है कि एक एक व्यक्ति कई जनहित याचिका दायर करने की कोशिश में लगा रहता है तो कुछ सूचना का अधिकार कार्यकर्ता दर्जनों ऐसी सूचनाएं मांगते हैं जिनसे उनका कोई मतलब होता। वह ना शहर के हित में होती है ना जनहित में। इसलिए अदालत का निर्णय सही और समयानुकुल है अगर जो लोग सही मायनों में जनहित की बात करते हैं उन्हें इससे अलग रखकर सोचा जाए तो।
    सुप्रीम कोर्ट ने गत मंगलवार को कहा कि जनहित याचिका (पीआईएल) श्निजी हित याचिका्य, श्प्रचार हित याचिका्य, श्धन हित याचिका्य, श्राजनीतिक हित याचिका्य बनकर रह गई है।
    यह टिप्पणी जस्टिस बीवी नागरत्ना ने सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश को लेकर 2006 में जनहित याचिका पर की। सुप्रीम कोर्ट के नौ जज की संविधान पीठ ने याचिकाकर्ता श्इंडियन यंग लॉयर्स एसोसिएशन्य को आड़े हाथ लिया। पीठ ने कहा कि ऐसी याचिका कूड़ेदान में फेंकने लायक है। जस्टिस बीवी नागरत्ना ने कहा कि हम हाईकोर्ट, सुप्रीम कोर्ट में उन आम लोगों की जनहित याचिकाओं पर सुनवाई करते हैं, जिन्हें सच में जरूरत है, न कि उन पर जो सिर्फ अखबारों में छपे लेखों के आधार पर दाखिल होती हैं। हम सिर्फ असली, सच्ची पीआईएल पर सुनवाई करते हैं।
    सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश को लेकर 2006 में जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान संविधान पीठ ने कहा कि आपने मंदिर में प्रवेश जैसे धार्मिक मुद्दों के लिए जनहित याचिका क्यों दाखिल की, क्या आपको और कोई काम नहीं हैं? क्या आप देश के मुख्य पुजारी हैं?
    देश के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अगुवाई वाली नौ जज की संविधान पीठ ने केरल के सबरीमाला मंदिर सहित विभिन्न धर्मों और संप्रदायों के धार्मिक स्थलों पर महिलाओं के साथ भेदभावपूर्ण व्यवहार के मुद्दे की सुनवाई के दौरान यह टिप्पणी की। मामले में बहस के 11वें दिन मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा कि याचिकाकर्ता कौन हैं? शुरू में ही इस तरह की याचिका खारिज कर देनी चाहिए थी। उन्होंने कहा कि यह जनहित याचिका कानूनी प्रक्रिया का दुरुपयोग है।
    आपको (एसोसिएशन) को ऐसी जनहित याचिका दाखिल करने के बजाए वकीलों के समुदाय और अपने युवा वकीलों के कल्याण के लिए काम करना चाहिए। संविधान पीठ में सीजेआई के अलावा जस्टिस बी.वी. नागरत्ना, एम.एम. सुंदरेश, अहसानुद्दीन अमनुल्लाह, अरविंद कुमार, ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह, प्रसन्ना बी. वराले, आर. महादेवन और जॉयमाल्य बागची शामिल हैं।
    याचिकाकर्ता इंडियन यंग लॉयर्स एसोसिएशन की ओर से अधिवक्ता रवि प्रकाश गुप्ता ने संविधान पीठ से कहा कि यह याचिका जून 2006 में अखबारों में छपे चार लेखों पर आधारित थी। इस पर सीजेआई ने कहा, आखिर अखबारों में प्रकाशित लेख जनहित याचिका दाखिल करने का आधार कैसे हो सकता है। याचिका दाखिल करने के मकसद से लेख लिखवाना तो बहुत आसान है। कानूनी निकाय की आस्था कैसे हो सकती है? जस्टिस नागरत्ना ने सवाल किया कि कोई संगठन जो एक कानूनी निकाय है, वह पूजा के अधिकार का दावा कैसे कर सकता है? उन्होंने याचिकाकर्ता से कहा कि आप जैसे किसी कानूनी निकाय की कोई आस्था कैसे हो सकती है?
    मुझे लगता है कि पात्र व्यक्ति को न्याय दिलाने के लिए इस संदर्भ में कार्य होना ही चाहिए लेकिन तथ्यों और सुबूतों के साथ ऐसा नहीं होना चाहिए कि याचिकाओं से अदालतों का समय बर्बाद हो या उनमें वादों की संख्या बढ़े। बाकी तो जिसको जो करना है वो करता रहेगा चाहे अपमान क्यों ना हो और नागरिकों को भविष्य में उसका नुकसान होने की संभावना बनती हो।
    (प्रस्तुतिः- रवि कुमार बिश्नोई संपादक दैनिक केसर खुशबू टाइम्स मेरठ)

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