शिमला, 14 फरवरी। सुप्रीम कोर्ट ने हिमाचल प्रदेश में पंचायती राज संस्थाओं के चुनाव 31 मई से पहले हर हाल में करवाने का आदेश दिया है। गत दिवस राज्य सरकार की याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायाधीश जॉयमाल्या बागची की खंडपीठ ने सरकार की उन दलीलों को खारिज कर दिया है, जिसमें परिसीमन का हवाला देकर समय बढ़ाने की मांग की थी। खंडपीठ ने कहा कि परिसीमन के गठन का अधूरा काम चुनाव टालने का कोई वैध कारण नहीं है। खंडपीठ ने हाईकोर्ट के फैसले को सही ठहराते हुए कहा कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया में देरी बर्दाश्त नहीं की जाएगी। हालांकि, अदालत ने चुनाव की समय सीमा में आंशिक संशोधन करते हुए नई तारीखें तय की हैं। खंडपीठ ने आरक्षण रोस्टर तैयार करने की समय सीमा को 28 फरवरी से बढ़ाकर 31 मार्च किया है। सरकार को इस समय सीमा के भीतर हर हाल में आरक्षण रोस्टर फाइनल करना होगा।
इसके बीच ही वोटर लिस्ट, पुनर्सीमांकन और आपत्तियां दायर की जाएंगी। कोर्ट ने याचिका का निपटारा करते हुए स्पष्ट किया कि इसके बाद समय विस्तार के लिए किसी भी आवेदन पर विचार नहीं किया जाएगा। अदालत ने सभी विभागों को एकजुट होकर काम करने और चुनाव का शेड्यूल फाइनल करने के आदेश दिए हैं। राज्य चुनाव आयोग, पंचायती राज एवं शहरी निकाय विभाग और प्रशासन को जल्द चुनाव की अधिसूचना जारी करने को कहा है। हिमाचल में पंचायतों का पांच वर्षीय कार्यकाल 31 जनवरी और 50 शहरी निकायों का कार्यकाल 18 जनवरी को पूरा हो चुका है। प्रदेश में 3577 पंचायतें, 90 पंचायत समितियां, 11 जिला परिषद और 71 शहरी स्थानीय निकाय हैं। अभी इनमें प्रशासक नियुक्त हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने समय सीमा एक महीने बढ़ाते हुए कहा कि हाईकोर्ट का निर्णय सही था कि परिसीमन कार्य के लंबित होने को स्थानीय निकाय चुनाव में विलंब और रुकावट का आधार नहीं बनाया जा सकता। पीठ ने कहा कि मानसून और उससे उत्पन्न राज्य की सामान्य कठिनाइयों को ध्यान में रखते हुए चुनाव प्रक्रिया 31 मई से पहले संपन्न होनी चाहिए। प्रधान न्यायाधीश ने स्पष्ट किया कि समय बढ़ाने के लिए कोई भी नया आवेदन स्वीकार नहीं किया जाएगा।
याचिकाकर्ता डिक्कन कुमार के अधिवक्ता नंद लाल ठाकुर ने बताया कि सर्वाेच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि वह उच्च न्यायालय के आदेश में हस्तक्षेप नहीं करेगा। स्थानीय निकाय चुनाव को आगे नहीं बढ़ाया जा सकता है। सरकार की मांग के आधार पर एक माह का समय दिया जाता है। इससे पहले, हाई कोर्ट ने 30 अप्रैल तक राज्य में चुनाव कराने के निर्देश दिए थे, जिसे राज्य सरकार ने चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट में स्पेशल लीव पिटीशन दायर की थी। प्रदेश सरकार ने चुनाव प्रक्रिया के लिए कम समय देने व आपदा प्रबंधन अधिनियम लागू होने को आधार बनाया था।
सर्वाेच्च न्यायालय ने सरकार की इस दलील को स्वीकार किया है कि पुनर्गठन, मतदाता सूची और आपत्तियों तथा जनगणना न होने के कारण ओबीसी आरक्षण को समय लगेगा। न्यायालय ने यह भी कहा कि बीच में समय सीमा बढ़ाने के आवेदन को स्वीकार नहीं किया जा सकता है। अब राज्य सरकार को आरक्षण रोस्टर को शीघ्र जारी करना होगा। प्रदेश में लगभग 3577 पंचायतें, 92 पंचायत समितियां, 12 जिला परिषद और शिमला नगर निगम को छोड़कर 73 शहरी निकायों में चुनाव प्रस्तावित हैं। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद राज्य चुनाव आयोग चुनाव कार्यक्रम की घोषणा करेगा। प्रशासनिक स्तर पर मतदाता सूचियों के अंतिम प्रकाशन और चुनावी तैयारियों को भी गति मिलेगी।
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