स्कूल फेडरेशन की केएल इंटरनेशनल स्कूल जागृति विहार में बीते दिनों हुई बैठक में स्कूलों के सामने आने वाली परेशानियों को लेकर कई बिंदुओं पर चर्चा की गई जिसमें लगभग ५० स्कूलों के संचालकों ने भाग लिया। विशेष चर्चा उपरांत सीबीएसई के नियमों को लेकर भी चर्चा की और तय हुआ कि आगामी सत्र में फीस कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स के तहस ७.५५ प्रतिशत तक बढ़ोत्तरी की जा सकती है। इस खबर को पढ़कर अभिभावकों में चर्चा के अनुसार फीस बढ़ाने से पहले मंडलायुक्त और स्कूल संचालकों व नागरिकों द्वारा पूर्व में बनाई गई समिति में चर्चा होनी चाहिए और फीस किसी भी तरह से नहीं बढ़ानी चाहिए क्योंकि कोरोना के बाद से आम आदमी बुरी तरह परेशान है। उसके सामने अन्य समस्याएं खड़ी है। सरकार बच्चों को साक्षर बनाने की कोशिश कर रही है और फीस लेकर निर्देश भी जारी हो चुके हैं। ऐसे में फीस बढ़ाने की बात करना शिक्षा के लिए बनी सरकारी नीति और नियमों के लिए ठीक नहीं है। स्कूल फेडरेशन अपने हितों की मजबूती के साथ साथ बच्चों और अभिभावकों की परेशानी ना बढ़े इस बात का ध्यान भी रखा जाना चाहिए। यह किसी से छिपा नहीं है कि जितनी कमाई विभिन्न नामों से ली जा रही फीस से स्कूलों की होती है उसके हिसाब से ना तो वो टैक्स देने को तैयार होते हैं और यह सभी जानते हैं कि ९० प्रतिशत स्कूल भूउपयोग परिवर्तन किए बिना निर्माण नीति के विपरीत बने हैं और कितनों से सड़क पर ही जेनरेटर रख दिए हैं और अभिभावकों के वाहन खड़ा करने की भी जगह नहीं है ऐसे में मनमर्जी से फीस बढ़ाने के निर्णय को ठीक नहीं कह सकते क्योंकि फेडरेशन सरकार या शासन नहीं है वो स्कूलों का संगठन है तो उसी के हिसाब से छात्रों के हित में सोचना चाहिए। मुझे लगता है कि फेडरेशन के पदाधिकारी और स्कूल संचालक भी इस बारे में निर्णय लेकर सरकारी प्रतिनिधि से मुलाकात कर फीस बढ़ाने के फैसले पर पुनर्विचार करें।
(प्रस्तुतिः- रवि कुमार बिश्नोई संपादक दैनिक केसर खुशबू टाइम्स मेरठ)
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