हमेशा देश के स्वच्छ शहरों में अव्वल रहने वाले मध्य प्रदेश के इंदौर शहर में दूषित पानी पीने से हुई गंभीर दुर्घटनाओं को लेकर देशभर में बवाल मचा हुआ है। जो इंतजाम हो रहे हैं उनके बारे में तो क्या कहना लेकिन मीडिया में मरने वालों की खबर १५ आ रही है। तो यहां के महापौर पुष्यमित्र भार्गव दस बता रहे हैं और एमपी हाईकोर्ट में इस मामले की हो रही सुनवाई में जस्टिस डीडी बंसल व जस्टिस राजेंद्र कुमार वाणी की अवकाशकालीन युगल पीठ के समक्ष सरकार की तरफ से पेश की गई रिपोर्ट में बताया गया कि दूषित पानी पीने के कारण चार लोगेां की मौत हुई। अभी बीते दिवस तक २९४ व्यक्तियों को उपचार के लिए अस्पतालों में भर्ती कराया गया था जिनमें से ३२ आईसीयू में और ९३ को इलाज के बाद छुटटी मिल गई। मरने वालों में एक बच्चा जो बड़ी मन्नतों के बाद जन्मा था इस त्रासदी ने उस छह माह के बच्चे को भी लील लिया और वो इसकी भेंट चढ़ गया। सरकार ने नगरायुक्त दलीप कुमार यादव को स्थानांतरित कर दिया है जबकि अपर आयुक्त रोहित सिसोनिया और पीएचई के प्रभारी अधीक्षण अभियंता संजीव श्रीवास्तव को निलंबित कर दिया गया है। समीक्षा बैठक में एमपी के सीएम मोहन यादव ने नगरायुक्त और अतिरिक्त नगरायुक्त को कारण बताओ नोटिस जारी करने का निर्द्रेश दिया था। सरकार कुछ भी कह ले लेकिन पूर्व सीएम उमा भारती का कहना है कि जिंदगी की कीमत दो लाख रूपये नहीं होती। उन्होंने सरकार और व्यवस्था पर तीखा प्रहार करते हुए एक्स पर अपनी प्रतिक्रिया दी। दूसरी तरफ लोकसभा में विपक्ष के नेता कांग्रेस सांसद राहुल गांधी का कहना है कि भाजपा शासित मध्य प्रदेश कुप्रशासक का केंद्र बन चुका है। उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री बसपा सुप्रीमो मायावती व सपा मुखिया अखिलेश यादव ने भी इस मामले को लेकर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। जो भी हो यह तो सही है कि सरकार कुछ भी कह ले लेकिन लापरवाही तो हुई और इसे राहुल गांधी के कथन अनुसार जहर बांट रहा है प्रशासन कुंभकर्णी नींद में है कहा गया है जबकि सीएम मोहन यादव कह रहे हैं कि सरकार कठोर निर्णय ले रही है। सवाल यह उठता है कि इस जानलेवा लापरवाही जिसमें १५ लोगों की मौत हो गई के बाद भी सिर्फ नगरायुक्त को हटाकर दो अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई कर सरकार द्वारा किया जा रहा है दावा कि कठोर कार्रवाई की जा रही है मजाक सा ही लगता है। क्योंकि सिर्फ यह कह देने से कि दूषित जल की आपूर्ति से हुई इस घटना पर हमें भी दुख है इस जानलेवा हादसे के आरोपों से मध्य प्रदेश की सरकार मुक्त नहीं हो सकती। यह तय कर कि नागरिकों तक कैसे पहुंचा मल मूत्र मिक्स पानी। जो लोग दोषी पाए जाएं उनको कम से कम समय से पूर्व सेवानिवृति की सजा तो मिलनी ही चाहिए। क्योंकि ऐसी घटनाएं होने और फिर लीपापोती से कुछ जिम्मेदार अफसरों में लापरवाही बढ़ती ही जा रही है। यह मामले आज के नहीं है। एक खबर के अनुसार इससे पूर्व लोकसभा और विधानसभाओं में ऐसे बिंदुओं को लेकर चर्चाएं हो चुकी हैं। २४ सितंबर १९६४ को विपक्ष ने इसे बड़ा मुददा लोकसभा में बनाने की कोशिश की थी तब तत्कालीन स्वास्थ्य मंत्री राजकुमारी अमृता कौर ने उपाय करने का आश्वासन दिया था लेकिन लगता है कि आश्वासन तो मिले लेकिन उपाय नहीं हुए। मेरा मानना है कि अब हमें पर्यावरण संगठनों और आकस्मिक आपदााओं की संभावनाओं को पूर्व में ही भांपने और समझने की सोच और उस पर कार्रवाई करने की नीति बनानी होगी और जो इसमें कोताही या लापरवाही बरते उसे सख्त सजा का प्रावधान भी हो। सबसे बड़ी बात कि ऐसे दोषी लोगों को बचाने की कोशिश करने वालों का भी पर्दाफाश होना चाहिए। इस समय हर कोई इंदौर की घटना पर सरकारी तंत्र को दोषी मान रहा है।
ऐसी घटनाओं में बव्च्चों की मौत हो या बड़ों की एक दशक की मन्नत के बाद पैदा हुए बच्चे सब अपनों को प्यारे होते हैं इसलिए सबकी मौत ही उनके परिवारों के लिए दुखद होती है। छह माह के बच्चे आवियान साहू के परिजनों ने दो लाख का मुआवजा लेने से इनकार कर दिया। यह अच्छा भी क्योंकि इससे तो ना वो वापस और ना परिवार का दुख कम हो सकता है। आवियान के परिवार के लिए यह जीवनभर का दुख हो गया है। यह बात जिम्मेदारों को भी समझनी होगी। यह कह देने से कि हम दुखी हैं व्यवस्था बना रहे हैं जिनके चले गए वो वापस आने वाले नहीं है। मुझे लगता है कि ऐसी घटनाएं तभी रूक सकती है जब जिम्मेदारों को यह अहसास हो कि ऐसी घटना ना हो सके और इसका सबक अन्य ले सके इसलिए नगरायुक्त दलीप कुमार यादव और दोनों अधिकारियों संजीव श्रीवास्तव और रोहित सिसोनिया को समय पूर्व सेवानिवृति देकर उन पर मुकदमा चलाया जाए। क्योंकि जिनके नहीं रहे उनको यह अहसास तो होना ही चाहिए कि जो हुआ उसके लिए दोषी व्यवस्थाओं में शामिल नहीं होंगे जिनके चलते लोगों की जान जाने की संभावनाएं बनी रहे। सरकार का यह कहना सही हो सकता है कि हालात काबू में है। इसके लिए भी आम आदमी को धन्यवाद दिया जाना चाहिए कि उन्होंने इतनी बड़ी घटना के बाद अपना संयम नहीं खोया और अपना दुख मना रहे हैं।
इंदौर की घटना के बाद देशभर में जिम्मेदारी पानी की टंकियों , सीवर की सफाई और स्वच्छ पेयजल की आपूर्ति पर मंथन करने लगे हैं। ऐसा हमेशा ही घटना के बाद विचार होने लगते हैं लेकिन कुछ दिनों बाद ऐसा ही होने लगता है और इसका उदाहरण लोकसभा में ऐसी घटनाओं को लेकर १९६४ में चर्चा हो जाने के बाद भी ऐसा होना इस बात का सबूत है। कहने का आश्य सिर्फ इतना है कि देश के सबसे साफ शहर इंदौर में नववर्ष की शुरूआत में ऐसी घटना लापरवाही और निष्क्रियता का परिणाम है। प्रधानमंत्री जी को इस बारे में गंभीर निर्णय लेने चाहिए क्योंकि उनकी पार्टी की पूर्व सीएम उमा भारती ने जो सवाल उठाए है वो महत्वपूर्ण है। दुखी परिवारों से माफी मांगने से कुछ होने वाला नहीं है। कुछ ऐसे फैसले जरूर हो जिनसे लगे कि यह मुददा सबकी चिंता का विषय है।
(प्रस्तुतिः- रवि कुमार बिश्नोई संपादक दैनिक केसर खुशबू टाइम्स मेरठ)
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