यूजीसी के नियमों और प्रयागराज के माघ मेले में शंकराचार्य के हुए अपमान से नाराज बरेली के सिटी मजिस्ट्रेट अलंकार अग्निहोत्री के इस्तीफे और निलंबन की चर्चाओं के अनुसार सिटी मजिस्ट्रेट अलंकार अग्निहोत्री का कहना है कि जब उन्होंने इस्तीफा दे दिया तो निलंबन का क्या औचित्य है। जानकारों का कहना है कि उन्हें इस्तीफा जिलाधिकारी को सौंपना चाहिए था। वैसा ना कर उन्होंने इस्तीफा राज्यपाल और मुख्य निर्वाचन आयोग को भेजा और इसे सोशल मीडिया पर वायरल कर दिया जो सरकारी सेवा नियमावली के खिलाफ है। हाईकोर्ट के वकील प्रभाकर अवस्थी का कहना है कि उनका इस्तीफा स्वीकार नहीं हुआ है। उन्हें अभी सेवारत मनाया जाएगा। इसलिए कार्रवाई नियमों के अनुसार की गई है। बताते हैं कि यूपी गवर्नमेंट कंटेट रूल्स १९५६ के तहत कोई भी प्रशासनिक अधिकारी या लोकसेवक सेवा में रहते हुए यूजीसी या शंकराचार्य जैसे संवेदनशील मुददों पर टिप्पणी नहीं कर सकता। फिलहाल शासन ने उन्हें शामली के डीएम कार्यालय से संबंध कर दिया है और बरेली के कमिश्नर भूपेंद्र एस चौधरी को जांच सौंपी है। दूसरी तरफ निलंबित सिटी मजिस्ट्रेट अलंकार अग्निहोत्री ने गत सुबह अपने आवास पर मीडिया के सामने आकर कहा कि उन्हें फोन पर अभद्र भाषा का इस्तेमाल करने पर आपत्ति जताई और डीएम आवास पर बंधक बनाने के आरोप लगाकर एसआईटी जांच की मांग की।
इस प्रकरण को लेकर दिल्ली से झारखंड तक पूरे प्रदेश में छात्रों और नागरिकों द्वारा भी अपनी राय व्यक्त करते हुए आंदोलन व धरना प्रदर्शन किए जा रहे हैं। निलंबित सिटी मजिस्ट्रेट अलंकार अग्निहोत्री ने भी धरना दिया। यूपी सरकार द्वारा एक्शन लिए जाने के बाद अयोध्या के जीएसटी के डिप्टी कमिश्नर प्रशांत कुमार सिंह शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद के विरोध में खुद यूपी के सीएम योगी के समर्थन में अपने पद से इस्तीफा दे दिया। दिल्ली में यूजीसी मुख्यालय पर सुरक्षा कड़ी कर दी गर्इ्र है। दूसरी तरफ केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने स्पष्ट कहा कि नए नियमों का नहीं होने दिया जाएगा दुरुपयोग। नही किसी से भेदभाव होने दिया जाएगा। इसे लेकर चिंता की बात यह है कि इस बिंदु पर नाराज प्रदेश के कई जिलों में भाजपाईयों द्वारा इस्तीफा भी दिया गया है तो हाथरस के सांसद का घेराव किया गया। अलीगढ़ में विराट हिंदू सम्मेलन में साध्वी प्राची की सभा में भी विरोध हुआ। सहारनपुर बागपत में भी भाजपाईयों के इस्तीफे हुए। जिलों से लेकर लखनऊ तक जो उबाल शुरु हुआ है उसमें अब नेता भी अपने सुझाव दे रहे हैं। पूर्व सांसद रीता बहुगुणा जोशी ने कहा कि सरकार को यूजीसी पर चिंतन मनन करना चाहिए क्योंकि यह देश की राजनीति से जुड़ा है। लोग सरकार की ओर आशा से देखते हैं इसलिए इस कानून पर पुनर्विचार हो। पूर्व बेसिक शिक्षा मंत्री रवीेंद्र शुक्ला ने चेतावनी दी कि यूजीसी का नया कानून वापस नहीं हुआ तो भाजपा से इस्तीफा दे देंगे। इस नियम को तत्काल वापस लेना चाहिए। उनका कहना है कि यूजीसी के प्रावधानों का मैं खुला विरोध करता हूं। सपा विधायक इकबाल महमूद ने यूजीसी के नियमों को गलत बताया और कहा कि इसमें सुधार करना चाहिए। उन्होंने कहा कि आगामी चुनाव में भाजपा को इसका खामियाजा भुगतना पड़ेगा तो अखिल भारतीय ब्राहमण महासभा के नेतृत्व में चंदौसी तहसील में प्रदर्शन हुआ और पीएम को नाम ज्ञापन एसडीएम को सौंपते हुए कहा कि नियम वापस नहीं लिया गया तो आंदोलन को दिल्ली तक फैलाया जाएगा। ब्राहमण महासभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष माधव मिश्र ने कहा कि यह नियम सामान्य वर्ग के छात्र छात्राओं को अपराधी की तरह प्रस्तुत करता है। इतना ही नहीं अवध में भाजपा शिक्षा प्रकोष्ठ के राजकिशोर पांडेय ने इस्तीफा दिया और निवर्तमान भाजपा जिलाध्यक्ष उदय प्रकाश त्रिपाठी ने पीएम के मन की बात कार्यक्रम का बहिष्कार किया। रायबरेली के भाजपा किसान मोर्चा के रमेश बहादुर ने विधायकों सांसदों को चूड़ियां भेजकर अपना विरोध जताया। अंतरराष्ट्रीय हिंदू परिषद के अध्यक्ष प्रवीण तोगड़िया ने कहा कि हिंदू समाज बंटना नहीं चाहिए और हिंदू समाज के साथ अन्याय नहीं होना चाहिए। फिरोजाबाद भाजपा जिला महिला की शशि तोमर ने इस्तीफा देकर नेतृत्व के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। इस्तीफा देने वाले निलंबित सिटी मजिस्ट्रेट अलंकार अग्निहोत्री का आरोप है कि उन पर मानसिक दबाव बनाने की कोशिश हो रही है। इसलिए वो बरेली में साथियों सहित कलक्ट्रेट में धरना देने बैठ गए।
सही गलत क्या है यह देखना सरकार और आंदोलनकारियों का मत है लेकिन जिस प्रकार से एकदम यूजीसी के नए नियमों और माघ मेले में शंकराचार्य एवं उनके शिष्यों के साथ हुए व्यवहार के विरोध में जो इस्तीफे देने और धरना प्रदर्शनों की शुरूआत हुई है वो अभी जिला स्तर तक हो लेकिन जिस प्रकार यूजीसी विरोधियों और शंकराचार्य समर्थकों का निलंबित सिटी मजिस्ट्रेट अलंकार अग्निहोत्री का सहयोग मिलना शुरु हुआ है उसे यूपी और केंद्र सरकार को गंभीरता से लेते हुए इन दोनों मुददों पर पुनर्विचार कर ऐसा निर्णय लिया जाए जिससे सांप भी मर जाए लाठी ना टूटे वाली कहावत के अनुसार जनता की मंशा पूरी होती हो और २०२७ के विधानसभा और २०२९ के लोकसभा चुनाव में जो वापसी का प्रयास भाजपाई कर रहे हैँ वो सफल हो सके और योगी आदित्यनाथ २०२७ में और २०२९ में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में सरकार का गठन हो सके। सरकार को यह भी देखना चाहिए कि अयोध्या के डिप्टी कमिश्रर का इस्तीफा जैसे घटनाएं विवाद को और भी बढ़ा सकती है। इसलिए जीएसटी के डिप्टी कमिश्नर प्रशांत सिंह के खिलाफ भी कार्रवाई की जानी चाहिए क्योंकि एक प्रकार से वो राजनीति कर रहे हैं क्योंकि यह सब जानते हैं कि सीएम योगी मजबूत जनाधार वाले नेता हैं। उनकी पार्टी के नेता कार्यकर्ता इस परिस्थिति का समाधान निकालकर विरोध प्रदर्शन समाप्त कर सकते हैं। लेकिन कुछ छात्र संगठनों के इस कथन को ध्यान रखना होगा जिसमें कहा जा रहा है कि अगर यूजीसी के नियमों को वापस नहीं लिया गया तो मंडल कमीशन जैसे हालात हो सकते हैं। मेरा मानना है कि केंद्र व प्रदेश में बहुमत की सरकारे हैं जिन्हें फैसला लेने से कोई रोकने वाला नहीं है। इसलिए युवाओं के भविष्य को ध्यान में रखते हुए शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान जो कह रहे हैं उसका विश्वास युवाओं को दिलाएं और यूपी के सीएम योगी को शंकराचार्य के साथ जो हुआ उसके दोषी अधिकारियों को वहां से हटकार इस प्रकरण की जांच कराएं और डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य के आग्रह को मानकर स्नान कर लें और नाराजगी को अफसरों से वार्ता कर इस मामले को यही समाप्त करें तो ज्यादा अच्छा है।
(प्रस्तुतिः- रवि कुमार बिश्नोई संपादक दैनिक केसर खुशबू टाइम्स मेरठ)
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