हर तीसरी बीमा पॉलिसी बीच में ही हो रही है बंद। खबर के अनुसार पहली बार सरेंडर पर मैच्योरिटी के अधिक भुगतान होने की बात सामने आई है। जानकारों का मानना है कि आम लोगों का जीवन बीमा पॉलिसी से मोहभंग हो रहा है। बीते पांच वर्षों में जीवन बीमा पॉलिसी रद्द करने वालों की संख्या बढ़ी है। पिछले वित्तीय वर्ष में ऐसे 38.3श् मामले सामने आए यानी मोटे तौर पर देखें तो हर तीसरी बीमा पॉलिसी समय से पहले बंद हुई।
विशेषज्ञों के अनुसार, बीमा बंद कराने के पीछे कई कारण हैं- जैसे भ्रामक दावे, आपात जरूरतें, बेहतर रिटर्न के अन्य विकल्प, टर्म प्लान व सरकार द्वारा टैक्स छूट खत्म कर देना। भ्रामक दावों को लेकर बीमा प्राधिकरण लगातार सख्ती बढ़ा रहा है। सूत्रों के अनुसार, इसे लेकर और सख्त नियम बनाए जाएंगे। ईआरडीए ने पॉलिसी की गलत बिक्री को रोकने के लिए बीमा एजेंटों और अन्य मध्यस्थों पर निगरानी बढ़ाने के साथ उनकी जवाबदेही तय करने का प्रस्ताव रखा है। आईआरडीए को लगातार शिकायतें मिल रही हैं कि झूठे और लुभावने सपने दिखाकर लोगों को बीमा पॉलिसी बेची जा रही हैं, जिसके चलते बाद में लोग शिकायत करते हैं या पॉलिसी बंद करा देते हैं।
पहली बार सरेंडर पर मैच्योरिटी से अधिक भुगतान
आरबीआई ने रिपोर्ट में कहा, 2021-22 में जीवन बीमा कंपनियों का भुगतान (बेनिफिट भुगतान) पांच लाख करोड़ था जो बीते वित्तीय वर्ष में बढ़कर 7.3 लाख करोड़ रुपये हो गया। इस अवधि में पॉलिसी को बंद करने वालों की संख्या भी तेजी से बढ़ी है। 2021-22 में जीवन बीमा पॉलिसी में से 25श् को सरेंडर एवं विड्रॉल के लिए आवेदन किया। उसके बाद से साल दर साल ये संख्या बढ़ती रही।
बीमा कंपनियों ने बीते वित्त वर्ष में भुगतान का 36.9श् धनराशि परिपक्वता भुगतान के तौर पर किया समय से पहले पॉलिसी बंद करके पैसा मांगे जाने की स्थिति में 38.3 फीसदी का भुगतान करना पर पड़ा। मृत्यु दावों पर 8.1श् भुगतान किया।
उक्त खबर पढ़कर जब सोचा तो यहबात सामने आई कि बीमा एजेंट पॉलिसी करते समय ग्राहकको इतने सब्जबाग दिखाते हैं कि वह कुछ सोच नहीं पाता। ज्यादातर बाते फार्म में अंग्रेजी में होतीहैं और फार्म इतना बड़ा होता है कि उसे कोई पढ़ नहीं पाता है। शुरु होने के बाद जब असलियत सामने आतीहै तो पता चलता कि उसके साथ धोखा हुआ है और वह पॅालिसी बंद कर देताहै। मैंने देखा है कि बड़ी पॉलिसी करने के लिए तीन चार एजेंट आएंगे और ऐसा माहौल बनाएंगे कि हम पॉलिसी से सुरक्षित हैं और हमारे वारिसों को इतना मिलेगा कि वह अपनी जिदंगी आसानी से काट सके। प्रथम भुगतान के बाद कई कई महीने तक पॉलिसी क्लियर नहीं होती हैऔर ग्राहक दिन भर इसमें दिमाग मारता है और जो पॉलिसी धन बढ़ाने की चल रही है उनमें घाटा होने के बाद भी एजेंट पैसे ले जाते हैँ और पूछने पर कहते हेँ कि इसमें हम क्या कर सकते हैं। एक बीमा एजेंट मेरे परिचित के यहां बीमा कराने पहुंचे और अच्छी बातें बताकर मुंगेरी लाल के सपने दिखाकर पॉलिसी कराने के लिए कहा। इनकार करने पर साल में उनके घर कैलेंडर डायरी और गिफ्ट भेजने लगे। जिस पर उसने पॉलिसी करा दी। कमीशन तो हर माह एजेंट को मिलना है और उसके बाद उन्होंने कैलेंडर डायरी भेजना बंद कर ही दिया और किस्त जमा नहीं होने पर फोन करने लगे। इस प्रकार की हो रही धोखाधड़ी से नुकसान तो हो रहाहै बीमा कंपनियों कोभी फायदा नहीं हो रहा। मेरा मानना है कि बीमा का फार्म हिंदी और कम शब्दों में बना हो। एजेंट उपभोक्ताको सही बात बताएं तो पॅालिसी बंद नहीं होगी क्योंकि सच जानने पर वही पॉलिसी लेगा जो इसे चलाता रहे। पॉलिसी कोई भी हो वित्त कानून और गृह मंत्रालय को ऐसी व्यवस्था करनी चाहिए जिससेबीमा कराते समय ग्राहकको हर बात साफ पता चल सके।
(प्रस्तुतिः- रवि कुमार बिश्नोई संपादक दैनिक केसर खुशबू टाइम्स मेरठ)
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