नई दिल्ली, 31 मार्च (जा)। देवी पुराण में वर्णित कथा के अनुसार, राजा दक्ष ने शिव जी के अपमान किया, तो इससे आहत होकर माता सती ने यज्ञ के अग्नि कुंड में अपने शरीर का त्याग कर दिया। जब भगवान शिव को इसके बारे में पता चला तो वह बहुत क्रोधित हो गए। वह माता सती के शरीर को उठाकर पूरे विश्व में घूमने लगे, जिससे चारो तरफ त्राही-त्राही मच गई। तब भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से मां सती के शरीर के कई टुकड़े कर दिए, जो धरती के विभिन्न स्थानों पर गिरे। आज इन्हीं स्थानों पर दिव्य 51 शक्तिपीठ स्थापित हैं। यह शक्तिपीठ न केवल भारत में बल्कि नेपाल, बांग्लादेश और पाकिस्तान में भी स्थित हैं। इसमें से एक है हिंगलाज माता शक्तिपीठ, जिसका जिक्र दुर्गा चालीसा में भी आता है। आज हम आपको इसी दिव्य के बारे में बताने जा रहे हैं।
हिंगलाज माता शक्तिपीठ पाकिस्तान के कब्जे वाले बलूचिस्तान के लसबेला जिले के दूरस्थ में स्थित है। इस मंदिर को हिंगलाज भवानी के नाम से भी जाना जाता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, इस स्थान पर माता सती का ब्रह्मरंध्र (सिर) गिरा था। जिस कारण यह अत्यंत महत्वपूर्ण और दिव्य शक्तिपीठों में से एक माना जाता है। यहां माता को कोटरी (भैरवी-कोट्टवीशा) और भैरव को भीमलोचन के नाम से जाना जाता है।
हिंगलाज माता शक्तिपीठ एक अत्यंत प्राचीन और प्रमुख हिंदू शक्तिपीठ है, जो लगभग 2000 वर्ष पूर्व से विद्यमान है। पहाड़ियों की तलहटी में एक दुर्गम गुफा में यह मंदिर विराजमान है। ऐसे में इसका प्राकृति सौंदर्य भी लोगों को अपनी ओर आकर्षित करता है। माना जाता है कि भगवान राम ने भी इस सिद्ध पीठ की यात्रा की थी।
हिंदू-मुस्लिम एकता का प्रतीक
यह स्थान हिंदू-मुस्लिम एकता का भी प्रतीक है। स्थानीय मुसलमान इस मंदिर को ‘नानी की हज’ और ‘बीबी नानी पीर’ कहकर भी पुकारते हैं। हर साल अप्रैल के महीने में कराची से वार्षिक तीर्थ यात्रा शुरू होती है और मेला भी लगता है। इसमें पाकिस्तान के विभिन्न प्रांतों से हजारों यात्री आते हैं। नवरात्र के दौरान भी यहां विशेष उत्सव का आयोजन होता है, जिससे श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ती है।
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