जीवन में आत्मा का अंश कहे जाने वाली औलाद ही एकमात्र ऐसी होती है जिसके बारे में मां बाप और परिवार वाले बुरा नहीं सोचते। शायद यही कारण है कि कोमा में कई वर्षो तक पड़े रहने के बावजूद भी मां बाप को यह आशा बनी रहती है कि आज नहीं तो कल उनका बच्चा ठीक हो ही जाएगा। जिनके परिवार में औलाद है वो यूपी के गाजियाबाद निवासी निर्मला राणा और अशोक राणा द्वारा अपने बेटे हरीश राणा जो चंडीगढ़ यूनिवर्सिटी में सिविल इंजीनियरिंग के अंतिम वर्ष के छात्र थे और बॉडी बिल्डर बनने का सपना देखते थे। रक्षाबंधन के दिन २०१३ में पीजी की चौथी मंजिल से गिरने के कारण कोमा में चले गए। जिससे शरीर बिल्कुल निष्क्रिय हो गया। देश मेें पहली बार सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस जेबी पादरीवाला और जस्टिस विश्वनाथन की पीठ ने भावुक माहौल में पहली बार किसी को इच्छा मृत्यु की अनुमति इस शर्त पर दी गई कि सपोटिंग सिस्टम धीरे धीरे हटाया जाए और सम्मान बना रहे। बताते चलें कि २०२४ में दिल्ली हाईकोर्ट से हरीश राणा का सपोटिंग सिस्टम हटाने की याचिका खारिज कर दी गई थी। लेकिन ३० दिनों की पुनर्विचार याचिका के बाद परिस्थितियों का आंकलन कर और मेडिकल के आधार पर खबरों के अनुसार यह फैसला दिया गया। स्मरण रहे कि देश में २०१८ को कॉमन कॉज के तहत इच्छामृत्यु को मान्यता दी गई थी। जिसमें अब हरीश राणा के मामले में यह आदेश दिया गया। बताते चलें कि १९७३ में मुंबई के केईएम हॉस्पिटल में कार्यरत नर्स अरुणा शानबाग के साथ हुए रेप के उपरांत वो कोमा में चली गई थी जिसकी २०१५ में मौत हुई। इस मामले में जर्नलिस्ट पिंकी विरानी की याचिका आठ मार्च २०१२ को ठुकरा दी थी। बताते चलें कि भारत में असाध्य दर्द में गरिमापूर्ण मृत्यु मान्य है जबकि दुनिया के कई हिस्सों में मरीज को घातक इंजेक्शन या दवा देना मान्य है जबकि भारत में केवल निष्क्रिय व्यक्ति को इच्छामृत्यु के तहत लाइफ सपोर्ट हटाने की व्यवस्था है। अमेरिका के कुछ हिस्सों में चिकित्सीय सहायता से आत्महत्या की अनुमति है। नीदरलैंड में इंजेक्शन अथवा डॉक्टरी मदद से इच्छामृत्यु कानूनी है। कनाडा में डॉक्टरी सहायत से इच्छामृत्यु की व्यवस्था है। हरीश राणा मामले में जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस विश्वानाथन की पीठ ने फैसला देते समय सेक्सपियर के प्रसिद्ध नाटक आदि की भी चर्चा की। कुछ भी हो माता पिता की बेबसी देखिए कि जिस उम्र में वो बेटा बेटी के बच्चे खिलाने की उम्मीद लगाए बैठे रहते हैं उस उम्र में वह १३ साल से बिस्तर पर लेटे अपने बेटे की इच्छामृत्यु की मांग करने के लिए मजबूर हेाना पड़ा। जब इस खबर को पढ़ने और सुनने वाले भावुक हो रहे हैं तो न्यायाधीश को फैसला देते समय कितना कष्ट हुआ हुआ होगा उसकी आसानी से अंदाजा लगा पाना मुश्किल है। जो भी हो इस फैसले से हरीश राणा को मुक्ति और जीवनभर का दुख माता पिता को हो गया लेकिन उन्हें एक राहत जरुर मिलेगी कि उनका बेटा अब किसी प्रकार का कष्ट नहीं झेलेगा। सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि ऐसे मामलों में व्यापक कानून बनाए जाने चाहिए और यह जरुरी है और साथ ही हरीश राणा के पिता अशोक राणा व माता निर्मला राणा को अपने बेटे को यादगार बनाने के लिए हरीश के शरीर के अंगों को दान देना चाहिए जिससे किसी ना किसी रुप में वो अपने बच्चे का अहसास करते रहे। इस सबके बावजूद निर्मला राणा और आशोक राणा के धैर्य और हौसले का सभी को कायल होना चाहिए कि उन्होंने इतने लंबे समय तक बच्चा सही हो जाएगा उम्मीद लगाए रखी और अब भी मुझे लगता है कि बेटे को कष्टों से छुटकारा दिलाने के लिए यह निर्णय लिया गया होगा वरना ऐसा तो सोचना भी आसान नहीं है। भगवान ऐसा दुख और ऐसी परिस्थितियां किसी के सामने ना उत्पन्न करे। इसके लिए भगवान से हरीश राणा की आत्मा को शांति और उसके माता पिता को यह गहन दुख सहने की शक्ति प्रदान करने की प्रार्थना ही की जा सकती है।
(प्रस्तुतिः- रवि कुमार बिश्नोई संपादक दैनिक केसर खुशबू टाइम्स मेरठ)
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