नई दिल्ली, 11 मई (ता)। सुप्रीम कोर्ट ने देशभर के हाइकोर्ट्स में लंबित जमानत याचिकाओं पर चिंता जताते हुए उनके त्वरित निपटारे के लिए कई महत्वपूर्ण सुझाव दिए। अदालत ने कहा कि जमानत मामलों की सुनवाई और सूचीबद्ध करने में हो रही देरी गंभीर चिंता का विषय है। चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (सीजेआई) सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की खंडपीठ मामले की सुनवाई कर रही थी, जिसमें पहले देश के सभी हाइकोर्टों से लंबित जमानत याचिकाओं का ब्योरा मांगा गया था।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अधिकांश हाइकोर्ट्स ने समय पर जानकारी उपलब्ध कराई और जमानत मामलों के त्वरित निपटारे के लिए पहल भी की। हालांकि कुछ हाइकोर्टों में लंबित मामलों की संख्या चिंताजनक बनी हुई है। अदालत ने विशेष रूप से इलाहाबाद हाईकोर्ट का उल्लेख करते हुए कहा कि वहां लंबित जमानत मामलों की संख्या बहुत अधिक है, जबकि जज प्रतिदिन सैकड़ों मामलों की सुनवाई कर रहे हैं। खंडपीठ ने कहा कि इलाहाबाद हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस और प्रशासनिक समिति को ऐसी व्यवस्था बनानी चाहिए, जिससे हर जमानत याचिका को सुनवाई की निश्चित तारीख मिल सके। अदालत ने न्यायिक संसाधनों के समेकन और जमानत मामलों को वरीयता देने का सुझाव दिया। सुप्रीम कोर्ट ने पटना हाईकोर्ट का भी जिक्र करते हुए कहा कि वहां कई बार जमानत मामलों में महीनों तक स्थगन दिया जाता है। अदालत ने मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में एक समय 63 हजार से अधिक लंबित जमानत याचिकाओं को भी चिंताजनक स्थिति बताया। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि उसकी टिप्पणियों को किसी हाईकोर्ट की आलोचना के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। अदालत ने कहा कि इन सुझावों का उद्देश्य न्यायिक व्यवस्था को अधिक प्रभावी बनाना है। सुप्रीम कोर्ट ने जमानत याचिकाओं के निपटारे को तेज करने के लिए कई सुझाव भी दर्ज किए। अदालत ने कहा कि जमानत मामलों की सूची साप्ताहिक या पखवाड़ा आधार पर स्वचालित सॉफ्टवेयर सिस्टम से तैयार की जानी चाहिए। खंडपीठ ने सुझाव दिया कि पहली सुनवाई से पहले स्टेटस रिपोर्ट दाखिल करना अनिवार्य किया जाए और जमानत याचिका की अग्रिम प्रति एडवोकेट जनरल ऑफिस या संबंधित सरकारी एजेंसी को दी जाए। अदालत ने कहा कि नई जमानत याचिकाओं को वैकल्पिक दिनों में या अधिकतम एक सप्ताह के भीतर सूचीबद्ध किया जाना चाहिए। साथ ही, जिन मामलों की सुनवाई नहीं हो पाती, उन्हें स्वतः दोबारा सूचीबद्ध किया जाए और उनके निपटारे की अधिकतम समय सीमा तय की जाए। सुप्रीम कोर्ट ने सरकारी वकीलों द्वारा अनावश्यक स्थगन मांगने की प्रवृत्ति पर भी चिंता जताई। अदालत ने कहा कि अदालतों का मौलिक अधिकारों की रक्षा करना “गंभीर संवैधानिक दायित्व” है। मादक पदार्थ संबंधी मामलों से जुड़े मामलों में फोरेंसिक रिपोर्ट में देरी का भी मुद्दा उठा। अदालत ने हाईकोर्ट्स के मुख्य जस्टिस से राज्य सरकारों और संबंधित एजेंसियों के साथ समन्वय कर फोरेंसिक लैब की रिपोर्ट समय पर उपलब्ध कराने को कहा। खंडपीठ ने पीड़ितों के अधिकारों पर जोर देते हुए कहा कि जांच अधिकारी यह सुनिश्चित करें कि पीड़ित हर चरण में कार्यवाही में भाग ले सकें और उन्हें कानूनी सहायता भी मिले।
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