नूरपुर, 04 अप्रैल (दि)। कठिन परिस्थितियों में भी जब वीर राम सिंह पठानिया युद्ध लड़ रहे थे, तो मां चंडी साक्षात उनके अंग संग रहकर उनके प्राणों की रक्षा करती थीं। मां चंडी के आशीर्वाद ने ही वीर राम सिंह पठानिया को जीवन के बिल्कुल विपरीत क्षणों में भी अपने शत्रु से लडऩे का साहस दिया। वीर राम सिंह पठानिया अपने गांव बास्सा वजीरां में सबसे ऊंचे स्थान पर बने मां चंडी के मंदिर में पूजा करते थे।
वीर राम सिंह पठानिया मां भारती के ऐसे वीर सपूत थे, जो महज 24 वर्ष की उम्र में भारत माता के लिए स्वतंत्रता संग्राम के आंदोलन में प्राणों की आहुति देकर अमर हो गए। 1857 में मंगल पांडेय जी के बलिदान से भी करीब 8 साल पहले अंग्रेजों के खिलाफ सशस्त्र युद्ध लड़ते हुए बलिदान हो गए। वीर राम सिंह पठानिया मां चंडी के अनन्य उपासक थे। कठिन परिस्थितियों में भी जब वीर राम सिंह पठानिया युद्ध लड़ रहे थे, तो मां चंडी साक्षात उनके अंग संग रहकर उनके प्राणों की रक्षा करती थीं। मां चंडी के आशीर्वाद ने ही वीर राम सिंह पठानिया को जीवन के बिल्कुल विपरीत क्षणों में भी अपने शत्रु से लडऩे का साहस दिया। वीर राम सिंह पठानिया अपने गांव बास्सा वजीरां में सबसे ऊंचे स्थान पर बने मां चंडी के मंदिर में पूजा करते थे। इन माता को आज भी पठानिया कुल के वंशज पुखरी माता मंदिर के नाम से गहन आस्था और श्रद्धा के साथ पूजते हैं।
इसके अलावा आसपास के कई अन्य श्रद्धालु भी मां चंडी से आशीर्वाद लेने आते हैं। वीर राम सिंह पठानिया की जयंती 10 अप्रैल को यहां विशेष पूजा की जाती है। इस अवसर पर यहां मंदिर प्रांगण में विशाल भंडारे का आयोजन किया जाता है। रात्रि में यहां महामाई के भव्य जागरण का भव्य आयोजन किया जाता है। यूं तो वर्ष भर अलग-अलग स्थान पर बसे पठानिया कुल के वंशज यहां दर्शनों के लिए आते हैं। मगर 10 अप्रैल को आयोजित की जाने वाली पूजा अर्चना के लिए विशेष रूप से यहां पठानिया वंश के परिवार दर्शनों के लिए आते हैं। वीर राम सिंह पठानिया पर माता चंडी का विशेष आशीर्वाद था। वह हर सुबह जल्दी उठकर पूजा अर्चना के लिए देवी के स्थल पर नियमित पूजा पाठ के लिए आते थे। यह पूजा अर्चना उनके जीवन का एक अभिन्न अंग था। ऐसा भी कहा जा सकता है कि देवी की पूजा अर्चना के बिना उनके दिन की शुरुआत ही नहीं होती थी। मां भगवती का भी अपने अनन्य भक्त पर पूरा आशीर्वाद था। संभवतः यही कारण रहा होगा कि उस समय नूरपुर रियासत के पास कोई विशाल सेना न होने और सक्षम नेतृत्व के अभाव में भी वीर राम सिंह पठानिया ने अपनी रियासत को अंग्रेजों से मुक्त करवाकर अपना शाही झंडा रियासत में फहरा दिया। माता चंडी के प्रति वीर राम सिंह पठानिया का इतना गहरा अनुराग था कि उन्होंने अपनी तलवार का नाम भी मां चंडी के नाम पर ही रख लिया था। नूरपुर के बास्सा वजीरां में रहने वाले राम सिंह पठानिया के वंशज उदय पठानिया बताते हैं कि युद्ध के दौरान वह चंडी तलवार को इतनी तेजी से चलाते थे कि वह दुश्मन को दिखती तक नहीं थी। ऐसा कहा जाता है कि जिन चंडी माता की वह उपासना करते थे, उसकी शक्ति चंडी नाम की उस तलवार में आ जाती थी। इस वर्ष भी पुखरी माता मंदिर विशेष पूजा अर्चना के लिए सज चुका है।
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