नई दिल्ली, 11 मई (ता)। देश के लाखों मंदिरों का संचालन करने वाली सरकारें क्या अपने ही कर्मचारियों का शोषण कर रही हैं? यह गंभीर प्रश्न उच्चतम न्यायालय में दायर एक जनहित याचिका के माध्यम से सामने आया है।
अधिवक्ता अश्विनी उपाध्याय द्वारा दायर इस याचिका में केंद्र और राज्य सरकारों को एक न्यायिक आयोग या विशेषज्ञ समिति गठित करने का निर्देश देने की मांग की गई है, जो सरकारी नियंत्रण वाले मंदिरों के पुजारियों, सेवादारों और अन्य कर्मचारियों के वेतन और सुविधाओं की समीक्षा कर सके।
याचिका का मुख्य तर्क यह है कि जब राज्य किसी मंदिर का प्रशासनिक और वित्तीय नियंत्रण अपने हाथ में ले लेता है, तो वहां नियोक्ता-कर्मचारी का संबंध स्वतः स्थापित हो जाता है। ऐसे में पुजारियों को सम्मानजनक वेतन न देना संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मिले आजीविका के अधिकार का सीधा उल्लंघन है।
न्यूनतम मजदूरी से भी वंचित हैं पुजारी याचिका में वाराणसी के काशी विश्वनाथ मंदिर और दक्षिण भारत के मंदिरों का उदाहरण देते हुए कहा गया है कि इन पवित्र स्थानों पर दिन-रात सेवा करने वाले कर्मचारियों को अकुशल श्रमिकों के बराबर भी न्यूनतम वेतन नहीं मिल रहा है। रंपरा बनाम प्रशासनिक कड़वाहट याचिका में तमिलनाडु की एक घटना का विशेष उल्लेख है, जहां प्रशासन ने पुजारियों को श्दक्षिणाश् लेने से रोकने का प्रयास किया था। यह मुद्दा इसलिए भी संवेदनशील है क्योंकि कई मंदिरों में पुजारियों को औपचारिक वेतन नहीं मिलता और वे पूरी तरह दक्षिणा पर निर्भर हैं।
2026 के महंगाई सूचकांक के दौर में, बिना किसी निश्चित आय के इन पुजारियों का जीवन भुखमरी की कगार पर है। याचिका में यह चुभता हुआ सवाल भी उठाया गया है कि सरकारें केवल लाखों मंदिरों को ही नियंत्रित क्यों कर रही हैं, जबकि अन्य धार्मिक स्थल इस प्रशासनिक पकड़ से बाहर हैं। अब देखना यह है कि क्या न्यायालय इन आध्यात्मिक रक्षकों को उनके हक का सम्मान दिला पाता है।
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