गैस का संकट सभी दावों के बाद खत्म होता नजर नहीं आ रहा है। इसके पीछे एजेंसी संचालकों और जमाखोरों का हाथ है या जिला पूर्ति विभाग के अफसरों की नाकामी यह तो वही जान सकते हैं लेकिन गैस की कमी के चलते घरों में लकड़ी के चूल्हे व कोयलें की भटटी से खाना बनाने का काम हो रहा है उससे हो सकता है कि सिलेंडरों की मारामारी थोड़ी कम हो जाए लेकिन इनसे उत्पन्न होने वाले प्रदूषणों से कई योजनाएं प्रभावित होंगी ही इनसे प्रदूषण बढ़ने की संभावना से इनकार नहीं किया सकता। मुझे लगता है कि गैस एजेंसियों पर अगर पकड़ बना ली जाए और अधिकारियों को सक्रिय किया जाए तो गैस की मारामारी में कमी आ सकती है और कोयला व लकड़ी जलाने से जो प्रदूषण बढ़ेगा उसका भी समाधान हो सकता है।
(प्रस्तुतिः- रवि कुमार बिश्नोई संपादक दैनिक केसर खुशबू टाइम्स मेरठ)
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