रहने के लिए बंगले कोठी की इच्छा रखने वालों तथा सैलानियों को अपनी ओर आकर्षित करने हेतु पहाड़ों पर जिस प्रकार से कंक्रीट के जंगलरुपी इमारतें खड़ी हो रही हैं उसने पहाड़ों में चुपचाप प्राकृतिक आपदाओं को निमंत्रण दिया है। दून विश्वविद्यालय और आईआईटी कानपुर के वैज्ञानिकों द्वारा किए गए अध्ययन में पता चला कि २०१० के बाद उत्तराखंड में प्राकृतिक आपदा का पैट्रन तेजी से बदल रहा है। परिणामस्वरूप बारिश की व्यवस्था बदल रही है। इमारतों का बढ़ता दबाव हिमालय को कमजोर कर रहा है। पूर्व में हुई केदारनाथ त्रासदी जैसी आपदा का खतरा गंभीर होता जा रहाहै। अब तो कहा जा रहा है कि इसका असर पहाड़ों तक सीमित नहीं है। मैदानी इलाकों में भी बाढ़ और जलसंकट का खतरा दिन प्रतिदिन बढ़ रहा है। इस क्षेत्र में वैज्ञानिकों ने पिछले तीन दशकों में आपदा के स्वरूप को समझने के लिए अलकनंदा मंदाकिनी भगीरथी यमुना घाटी का अध्ययन किया। जिससे यह अहसास हो रहा है कि पहाड़ खामोश तो है मगर उसके अंदर बदलाव हो रहा है। बुजुर्गों का कहना है कि हिमालय पहले की तरह चेतावनी देकर आपदा नहीं लाता। अब तो अचानक पहाड़ दरकते हैं। भूस्खलन होता है और देखते ही देखते आसपास का क्षेत्र आपदा की चपेट में आ जाता है। हमारे वैज्ञानिक और पर्यावरणविद पिछले कई दशक से इस बारे में सरकार और जिम्मेदारों का ध्यान खींचने की ओर कोशिश कर रहे हैं। ऐसा नहीं है कि सरकार कुछ ना कर रही हो मगर नियम बनते हैं लेकिन कहीं विकास के नाम पर तो कहीं धनवानों के दबाव तो कुछ मौकों पर अपने स्वार्थों को लेकर इकटठा होने वाले लोगों की संतुष्टि के चक्कर में उनका पालन नहीं हो पाता। जैसा पिछले एक दशक में नजर आ रहा है अब पर्यावरणविद जलपुरुष तो बहुत निकलकर आ रहे हैँ लेकिन गुरु महाराज जम्भेश्वर जी या चिपको आंदोलन के जनक सुंदरलाल बहुगुणा जैसे निस्वार्थ और मानव जाति के लिए सोचने वाले कम सामने आ रहे हेैं। बताते चलें कि राजस्थान में कई सौ साल पहले गुुरु जम्भेश्वर ही महाराज की प्रेरणा से एक पेड़ को बचाने के लिए ३६५ महिलाओं ने अपनी गर्दन कटवा दी थी। आज भी उनको आत्मसात कर बिश्नोई समाज वहां सक्रिय है। उत्तराखंड में बहुगुणा ने जो चिपको आंदोलन चलाया वनों को बचाने के लिए अब ऐसा जज्बा किसी में नजर नहीं आ रहा है। कोशिश बहुत हो रही है मगर कोई ना कोई बिंदु ऐसा आड़े आ जाता है कि उन पर पानी फिरने लगता है। पूर्व में केंद्र सरकार द्वारा बाढ़ और सूखे को ध्यान में रखकर नदी जोड़ों अभियान की शुरुआत की थी। इसके लिए बड़े आयोजन भी हुए लेकिन वो किस स्थिति में है यह किसी को पता नहीं चल पा रहा है। कहने का मतलब सिर्फ इतना है कि पर्यटकों को सुविधाएं भी जरुरी है। रहने के लिए घर भी सभी को चाहिए लेकिन अगर नई तकनीकी का उपयोग कर पहाड़ों पर सैलानियों और रहने के लिए भारी पत्थरों के बजाय हल्के घर बनाए जाएं तो शायद आपदा की संभावनाएं कम हो सकती हैं। इसके लिए जरुरी है कि जल जमीन और पहाड़ के दोहन पर रोक लगे। क्योंकि जब तक यह नहीं होगा पहाड़ भी धंसेंगे और मकान भी टेढ़े हेांगे। इसका नुकसान जानमाल के रुप में आम आदमी को ही होना है। इसलिए जनहित में केंद्र व प्रदेशों की सरकारें व पहाड़ी राज्यों के नेताओं व अफसरों द्वारा जनहित में इस बारे में नीति बनाकर काम किया जाए। वरना मानव जीवन के साथ साथ जीव जंतुओं और पेड़ पौधों को खतरा होने की बात से इनकार नहीं किया जा सकता।
(प्रस्तुतिः- रवि कुमार बिश्नोई संपादक दैनिक केसर खुशबू टाइम्स मेरठ)
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