प्रयागराज, 24 मार्च (दप्रि)। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने सरकारी नियोक्ताओं द्वारा नियमित भर्ती प्रक्रिया को दरकिनार कर आउटसोर्सिंग एजेंसियों के माध्यम से नियुक्त कर्मचारियों से लंबे समय तक काम लेने की प्रथा की निंदा की। न्यायमूर्ति विक्रम डी. चौहान ने इस संबंध में एक रिट याचिका स्वीकार करते हुए कहा कि इस तरह की व्यवस्था शोषण और अन्याय के लिए व्यापक गुंजाइश उपलब्ध कराती है।
कैफी अहमद खान द्वारा दायर याचिका पर अदालत ने बरेली नगर निगम को उसकी सेवा को नियमित करने पर विचार करने का निर्देश दिया। खान पिछले 13 वर्षों से आउटसोर्स कर्मी के तौर पर बतौर कंप्यूटर ऑपरेटर अपनी सेवाएं दे रहे हैं।
अदालत ने कहा कि नियोक्ता द्वारा सतत रूप से आउटसोर्स के आधार पर व्यक्ति को काम पर रखना जहां कार्य अपरिहार्य प्रकृति के हैं, से संकेत मिलता है कि यह शोषणात्मक है खासकर तब जब विभाग का काम आउटसोर्सिंग एजेंसी द्वारा उपलब्ध कराए गए मानव संसाधन द्वारा किया जाता है। इससे मंजूर पद पर नियमित कर्मचारी की नियुक्ति टाली जा रही है। वर्ष 2019 में याचिकाकर्ता की रिट याचिका उच्च न्यायालय द्वारा अधिकारियों को उसके दावे पर विचार करने का निर्देश देकर निस्तारित कर दी गई थी। हालांकि, नगर आयुक्त ने दिसंबर, 2020 में उसके दावे को सिरे से खारिज कर दिया।
अधिकारी ने फरवरी, 2016 के सरकारी आदेश का हवाला दिया जिसमें कहा गया है कि 31 दिसंबर, 2001 को या इससे पूर्व नियुक्त दैनिक वेतनभोगी कर्मचारियों को नियमित करने की कानूनी रूप से अनुमति है। याचिकाकर्ता के वकील ने उच्चतम न्यायालय द्वारा 2024 में जग्गो बनाम केंद्र सरकार के मामले में दिए गए निर्णय का हवाला दिया जिसमें शीर्ष अदालत ने सरकारी संस्थानों द्वारा लंबे समय तक अस्थायी आधार पर कर्मचारियों को रखने की प्रथा की आलोचना की थी जिससे विभिन्न श्रम अधिकारों का उल्लंघन होता है।
अधिवक्ता ने दलील दी कि याचिकाकर्ता को लंबे समय तक रोजगार में बनाए रखना इस बात का संकेत है कि वह कार्य स्थायी प्रकृति का है और नियमित करने से इनकार मनमाना है। पीठ ने प्रतिवादी संख्या 3-नगर आयुक्त, नगर निगम, बरेली द्वारा पारित आदेश को दरकिनार कर दिया और निर्देश दिया कि याचिकाकर्ता को नियमित करने के उसके दावे पर चार सप्ताह के भीतर विचार किया जाए।
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