लखनऊ 16 मार्च। यूपी पुलिस उप निरीक्षक भर्ती परीक्षा में पूछे गए एक प्रश्न को लेकर विवाद थम नहीं रहा है। परीक्षा में पूछे गए एक बहुविकल्पीय प्रश्न में अवसर के अनुसार बदलने वाला’ वाक्यांश के लिए उत्तर के रूप में दिए गए चार विकल्पों में से एक विकल्प ‘पंडित’ शब्द भी था। इस पर कई लोगों ने आपत्ति जताई है और इंटरनेट मीडिया पर इसका विरोध हो रहा है। गीतकार मनोज मुंतशिर ने भी इस संबंध में इंटरनेट मीडिया पर पोस्ट कर नाराजगी जताई है। उन्होंने लिखा कि जिस व्यक्ति ने यह प्रश्नपत्र तैयार किया है, उसके खिलाफ तुरंत कार्रवाई होनी चाहिए।
उधर, उच्च शिक्षा मंत्री योगेंद्र उपाध्याय ने भी इस पर आपत्ति जताते हुए कहा कि परीक्षा में पूछे गए प्रश्न के विकल्पों में ‘पंडित’ शब्द देना न केवल अनुचित है, बल्कि इसका कोई औचित्य भी नहीं है। उनके अनुसार ऐसा प्रश्न और उसके विकल्प किसी भी दृष्टि से उचित नहीं माने जा सकते।
पुलिस को संदेश क्षमा मांगकर डिलीट करना चाहिए
प्रयागराज प्रतियोगी छात्र संघर्ष समिति के अध्यक्ष अवनीश पांडेय कहते हैं कि परीक्षा हो गई। पेपर आउट नहीं हुआ तो फिर छात्रों को विश्लेषण से रोकना तानाशाही है। कई प्रतियोगी छात्र, कोचिंग संस्थान, शिक्षक प्लेटफार्म पर प्रश्नों का हल निकाल कर कठिनाई, प्रश्नों की शुद्धता और पैटर्न का मूल्यांकन करते हैं। उन्होंने कहा कि विश्लेषण से रोकने का अधिकार पुलिस को किसने दिया है। विज्ञापन की शर्तों में या कहीं निर्देश है कि परीक्षा समाप्त होने के बाद कोई पेपर हल नहीं करेगा। पुलिस को संदेश क्षमा मांगकर डिलीट करना चाहिए।
प्रश्नपत्रों के विश्लेषण पर रोक गलत, न्यायालय जाएंगे प्रतियोगी
प्रतियोगी छात्र संघर्ष समिति के मीडिया प्रभारी प्रशांत पांडेय का कहना है कि अब तक के इतिहास में किसी भी भर्ती बोर्ड या आयोग ने परीक्षा समाप्त होने के बाद प्रश्नपत्रों के विश्लेषण पर प्रतिबंध नहीं लगाया है। उन्होंने कहा कि उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग, शिक्षा सेवा चयन आयोग सहित अन्य भर्ती परीक्षाओं में आए विवादित प्रश्नों पर हमेशा छात्रों ने आवाज उठाई है। यदि परीक्षा समाप्त होने के बाद पेपर का विश्लेषण ही प्रतिबंधित कर दिया जाएगा तो पारदर्शिता पर प्रश्नचिह्न खड़े होंगे। प्रशांत ने कहा कि ‘पंडित’ शब्द को लेकर उठे विवाद को गंभीरता से लिया जाना चाहिए। यदि सरकार प्रश्न बनाने वाले जिम्मेदार व्यक्तियों के खिलाफ कार्रवाई नहीं करती तो वे उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाएंगे। समिति के प्रतिनिधियों का तर्क है कि इस प्रकार का प्रश्न करोड़ों लोगों की भावनाओं को आहत करता है और इसे संविधान के अनुच्छेद 15 की भावना के विरुद्ध बताया जा रहा है।

