प्रयागराज 24 जुलाई। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पशुपालन विभाग के कर्मचारियों के वेतनमान से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में राज्य सरकार की विशेष अपील खारिज करते हुए कहा है कि एक बार दो पदों का विलय कर उन्हें एक ही संवर्ग (कैडर) में शामिल कर दिया जाए, तो पूर्व पदनाम के आधार पर अलग-अलग वेतनमान देना संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 का उल्लंघन है. अदालत ने राज्य सरकार को निर्देश दिया कि संबंधित कर्मचारियों को 1 जनवरी 1986 से 1350–2200 रुपये का वेतनमान सभी परिणामी लाभों सहित दिया जाए और तीन माह के भीतर आदेश का पालन किया जाए.
न्यायमूर्ति सौमित्र दयाल सिंह और न्यायमूर्ति स्वरूपमा चतुर्वेदी की खंडपीठ ने यह आदेश राज्य सरकार की उस विशेष अपील पर दिया है, जिसमें 24 जुलाई 2019 को एकलपीठ द्वारा दिए गए आदेश को चुनौती दी गई थी. मामले के अनुसार, वर्ष 1981 से 1986 के बीच नियुक्त लाइव स्टॉक डेवलपमेंट असिस्टेंट (बाद में लाइव स्टॉक एक्सटेंशन इंस्पेक्टर) और लाइव स्टॉक एक्सटेंशन ऑफिसर अलग-अलग पद थे, लेकिन दोनों के लिए योग्यता और कार्य लगभग समान थे. इस वेतन असमानता की शिकायत पर गठित समिति ने पाया कि दोनों पदों के कार्यों में कोई वास्तविक अंतर नहीं है. इसके बाद राज्य सरकार ने 3 मार्च 1990 और 5 जून 1991 के शासनादेशों के जरिए दोनों पदों का 1 जनवरी 1986 से प्रभावी विलय कर एक ही संवर्ग बना दिया और सभी कर्मचारियों को समान वेतनमान देने का निर्णय लिया.
हालांकि, बाद में 2 अप्रैल 1992 के शासनादेश के जरिए केवल उन कर्मचारियों को 1350–2200 रुपये का संशोधित वेतनमान दिया गया, जो 1 जनवरी 1986 से पहले मूल रूप से लाइव स्टॉक एक्सटेंशन ऑफिसर थे, जबकि विलय के बाद उसी संवर्ग में शामिल अन्य कर्मचारियों को पुराने वेतनमान पर ही रखा गया. कर्मचारियों ने इसे भेदभावपूर्ण बताते हुए हाईकोर्ट में चुनौती दी थी.
राज्य सरकार ने दलील दी कि यह व्यवस्था पुराने वरिष्ठ अधिकारियों के हितों की रक्षा और वेतन विसंगति दूर करने के लिए की गई थी. वहीं कर्मचारियों ने कहा कि जब दोनों पदों का विलय होकर एक समान संवर्ग बन गया और सभी समान कार्य कर रहे हैं, तब केवल पुराने पदनाम के आधार पर अलग वेतनमान देना असंवैधानिक है.
खंडपीठ ने कहा कि संवर्ग के विलय के बाद कर्मचारियों की पुरानी पहचान समाप्त हो जाती है और सभी एक समान वर्ग का हिस्सा बन जाते हैं. ऐसे में केवल इस आधार पर कि कोई कर्मचारी पहले किस पद पर था, वेतन में अंतर नहीं किया जा सकता. अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के एस शिवगुरु बनाम तमिलनाडु राज्य फैसले का हवाला देते हुए कहा कि समान कार्य करने वाले और एक ही संवर्ग में शामिल कर्मचारियों के साथ अलग व्यवहार न्यायसंगत नहीं है.
अदालत ने कहा कि राज्य सरकार ने स्वयं यह स्वीकार किया था कि दोनों पदों के कार्य और जिम्मेदारियां समान हैं और इसी आधार पर उनका विलय किया गया था. ऐसे में बाद में उसी संवर्ग के भीतर दो अलग-अलग वेतनमान लागू करना विलय के मूल उद्देश्य के विपरीत है और समानता के संवैधानिक सिद्धांत का उल्लंघन करता है. इसी आधार पर हाईकोर्ट ने राज्य सरकार की विशेष अपील खारिज कर एकलपीठ के आदेश को बरकरार रखा.

