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    Home»देश»आपसी सहमति से तलाक में विवाह पंजीकरण जरूरी नहीं: हाईकोर्ट
    देश

    आपसी सहमति से तलाक में विवाह पंजीकरण जरूरी नहीं: हाईकोर्ट

    adminBy adminAugust 30, 2025No Comments6 Views
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    प्रयागराज,30 अगस्त। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि विवाह पंजीकृत नहीं है और दोनों पक्ष उसके अस्तित्व को स्वीकार करते हैं तो हिंदू विवाह अधिनियम 1955 के तहत आपसी सहमति से तलाक की कार्यवाही में ट्रायल कोर्ट विवाह पंजीकरण प्रमाण पत्र जमा करने के लिए जोर नहीं दे सकता। इसी के साथ न्यायमूर्ति मनीष कुमार निगम ने आजमगढ़ की फैमिली कोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें प्रमाण पत्र दाखिल करने की आवश्यकता से छूट देने की याचिका खारिज कर दी गई थी।

    इस मामले में पति और पत्नी ने 23 अक्टूबर 2024 को हिंदू विवाह अधिनियम 1955 की धारा 13 (B) के तहत आपसी सहमति से तलाक के लिए संयुक्त रूप से याचिका की थी। कार्यवाही के दौरान फैमिली कोर्ट ने पक्षकारों को विवाह प्रमाण पत्र दाखिल करने का आदेश दिया। याची ने पत्नी के समर्थन से एक अर्जी देकर कहा कि प्रमाण पत्र नहीं है क्योंकि उनका विवाह पंजीकृत नहीं हुआ था। तर्क दिया कि हिंदू विवाह अधिनियम के तहत पंजीकरण अनिवार्य नहीं और छूट देने की प्रार्थना की। फैमिली कोर्ट ने उनके आवेदन को खारिज कर दिया था।

    हाईकोर्ट में याची के वकील ने तर्क दिया कि हिंदू विवाह अधिनियम 1955 की धारा आठ विवाह के पंजीकरण का प्रावधान करती है, पंजीकरण के अभाव में विवाह को अमान्य नहीं करती है। यह भी कहा गया कि उत्तर प्रदेश विवाह पंजीकरण नियमावली 2017 भी नियम 6 के तहत यह स्पष्ट करती है कि केवल इसलिए कि विवाह पंजीकृत नहीं था उसे अवैध नहीं माना जाएगा।

    न्यायालय ने कहा कि जहां राज्य के नियम पंजीकरण को अनिवार्य बनाते हैं, वहां भी पंजीकरण के अभाव में विवाह को अमान्य घोषित करने वाला कोई नियम नहीं हो सकता। इस स्थिति को उत्तर प्रदेश विवाह पंजीकरण नियमावली 2017 के नियम 6 (2) द्वारा और समर्थन मिलता है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि पंजीकरण प्रमाण पत्र दाखिल करने की आवश्यकता केवल उन मामलों में है जहां विवाह अधिनियम की धारा 8 के तहत पंजीकृत है।

    स्वीकार्य रूप से इस मामले में 2010 में संपन्न हुआ विवाह पंजीकृत नहीं है और इसलिए पंजीकरण प्रमाण पत्र दाखिल करने की कोई आवश्यकता नहीं है। कोर्ट ने इस सिद्धांत का भी आह्वान किया कि प्रक्रियात्मक कानून न्याय की सुविधा के लिए हैं, न कि बाधा उत्पन्न करने के लिए। न्यायालय ने कहा कि यह ‘प्रक्रिया’ है, जो न्याय को सुगम बनाने और उसके उद्देश्यों को आगे बढ़ाने के लिए बनाई गई है। यह दंड और जुर्माने के लिए कोई दंडात्मक विधान नहीं है।

    यह लोगों को फंसाने के लिए बनाई गई कोई चीज नहीं है। हाईकोर्ट ने माना कि फैमिली कोर्ट का विवाह प्रमाण पत्र दाखिल करने पर जोर देना पूरी तरह से अनुचित था, खासकर जब विवाह के तथ्य पर कोई विवाद नहीं था और इसे आपसी सहमति याचिका में दोनों पक्षों द्वारा स्वीकार किया गया था। इसी के साथ अदालत ने याचिका को स्वीकार करते हुए फैमिली कोर्ट के आदेश को रद्द कर दिया। साथ ही फैमिली कोर्ट को लंबित आपसी तलाक के मामले का कानून के अनुसार शीघ्र निर्णय लेने का निर्देश दिया।

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