आम आदमी पार्टी के 7 राज्यसभा सदस्यों द्वारा राघव चड्ढा के नेतृत्व में पार्टी से अलग हो गये जिनमें से तीन राघव चढ्ढा, अशोक मित्तल संदीप पाठक भाजपा में शामिल हो गये। संभावना व्यक्त की जा रही है कि हरभजन सिंह, राजिन्द्र गु़प्ता, विक्रम जीत सिंह साहनी, स्वाति मालीवाल भी भाजपा में शामिल हो सकती हैं जो भी हो जब उन्होंने आस छोड़ दी तो वह कहीं भी जाए उससे क्या फ्रर्क पड़ता है सोचना यह है कि अगले वर्ष पंजाब में चुनाव होने हैं ऐसे में पार्टी के राज्यसभा सदस्यों ७ में से ४ पंजाब से बताये जाते हैं। पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने कहा है कि यह पंजाबियों के साथ धोखा किया गया हैं। उनको वहां भी कुछ नहीं बनने वाला भाजपा केवल रंग लगाकर छोड़ देती है तो सामाजिक नेता अन्ना हजारे का कहना है कि यह आप नेतृत्व की गलती से हुआ अगर सही रास्ता अपनाया होता तो यह सांसद पार्टी छोड़कर नहीं जाते। चर्चा है कि क्या इन राज्यसभा सदस्यों पर दलबदल कानून लागू होगा तो इस संदर्भ में यही कहा जा सकता है कि संविधान की दसवीं अनुसूची के तहत इन राज्यसभा सदस्यो ंपर अयोग्यता का खतरा नहीं है। इनकी सदस्यता बनी रहेगी। भले ही पंजाब के मुख्यमंत्री भागवंत मान साहब इसे गद्दारी कह रहे हों लेकिन आप में हुई यह सबसे बड़ी फूट अगर पार्टी ने अपने को नहीं संभाला तो बहुत बड़ी नुकसानदायक साबित हो सकती है। लेकिन यह बात सही है कि राज्यसभा में भाजपा अपने दम पर इनके आप छोड़ने से बहुमत के करीब पहुंच चुकी है। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष ने राघव चढ्डा आदि ने मिठाई खिलाते हुए उनका स्वागत किया। कुछ लोग इसे अरविंद केजरीवाल की नीति और सोच तथा हठधर्मी के खिलाफ हुआ विद्रोह भी बता रहे हैं मगर कहीं जब कुछ गलत होता है तो इस प्रकार की बाते होना एक आम बात है लेकिन फिलहाल दिल्ली स्थिति भाजपा के मुख्यालय में गत शुक्रवार को इसके राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन की उपस्थिति में राघव चड्ढा आदि शामिल हो गये।
राजनीति में फिलहाल का यह एक बड़ा धमाका कहा जा सकता है और यह भी पक्का है कि इसके बाद आम आदमी पार्टी के लिए पंजाब में होने वाला विधानसभा चुनाव चुनौती पूर्ण होगा मगर जैसा कहा जा सकता है कि पार्टी पार्टी होती है किसी के आने जाने से कोई फर्क नहीं पड़ता हर आदमी को अपनी सोच के साथ चलने का अधिकार है फिर यह तो राज्यसभा के सदस्य हैं लेकिन अच्छा तो यह होता कि यह सभी सांसद राज्यसभा सदस्य आप छोड़ने से पहले अपनी सदस्यता का इस्तीफा देते और फिर जिसे जहां जाना था जाते तो यह एक स्वच्छ राजनीति का संदेश भी इसे कह सकते थे। आज केजरीवाल ही नहीं अन्य विपक्षीदलों के लोग भी आप छोड़ने वालों को धोखेबाज बता रहे हैं। मगर इस आया राम गया राम की वजेह से एक बात तो हो गयी कि भविष्य में राजनीतिक दलों का उच्च नेतृत्व राज्यसभा सदस्य बनाने के समय बहुत सोच समझकर निर्णय लिया करेंगे कुछ हुआ हो या न हुआ हो लेकिन केजरीवाल ने अपनी पार्टी के आम आदमी के कार्यकर्ता को राज्यसभा में भेजने के बजाये इन नामचीन लोगों को भेजा जिन्होंने एक साथ पार्टी छोड़ने में कोई कोर कसर नहीं रखी है।
इससे भी इनकार नहीं कर सकते कि भविष्य में भाजपा इन्हें संसद या राज्यसभा में भेजेगी या नहीं मगर ईमानदार कार्यकर्ताओं की निगाह में जो आम मतदाताओं का मानना है कि इन पर धोखेबाजी का ठप्पा तो लग ही गया है। बाकी तो आना जाना लगा ही रहता है केजरीवाल लीडर है और यह कहना गलत नहीं है कि अन्ना हजारे की दिल्ली आंदोलन के बाद अरविंद केजरीवाल ने आप पार्टी अपने दम पर खड़ी की थी और वह आगे भी ऐसा कर सकते हैं बस आवश्यकता इस बात की है कि इस बात पर विचार जरूर होना चाहिए कि कु छ बड़े लोगों को राज्यसभा में भेजने से पहले आम कार्यकर्ताओं की राय भी जान लेनी होगी। बाकी तो यह राजनीति महासमुंद्र है कब कौन किस समय इसमें गोता लगाकर कहा चला जाये यह कोई विश्वास के साथ नहीं कह सकता।
(प्रस्तुतिः- रवि कुमार बिश्नोई संपादक दैनिक केसर खुशबू टाइम्स मेरठ)
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