राजनीतिक क्षेत्रों में होने वाली चर्चानुसार इस मानसून सत्र में केन्द्र सरकार के विधायी कामकाज में महिला आरक्षण विधेयक फिर से शामिल हो सकता है। क्योंकि पिछली बार के सत्र में इस परिसीमन विधेयक के साथ ही दो तिहाई समर्थन न मिलने के कारण सरकार को पीछे हटना पड़ा था बताते हैं कि राज्यसभा में तो सरकार के सामने ज्यादा समस्या इसे लेकर नहीं आएगी लेकिन लोकसभा में अंकगणित साधने की चुनौती का सामना करने के लिए इसके प्रबंधकों द्वारा द्रमुक तथा एनसीपी शरद पवार व सपा से सम्पर्क साधने के प्रयास किये जा रहे बताये जाते हैं क्योंकि यह महिला आरक्षण विधेयक मोदी सरकार के सबसे अहम एजेंडों में शामिल बताया जा रहा है लेकिन पूर्ण बहुूमत लोकसभा में न बन पाने के चलते सरकार का प्रयास है कि अगर सपा और द्रमुम के सांसद प्रस्ताव आने के बाद मतदान से दूर रहें तो सदन की प्रभावी संख्या ४८४ रह जाएगी तब दो तिहाई के मतदान से आंकड़ा ३२० पर आ जाएगा और सरकार प्रस्ताव पास करा लेगी। लेकिन उसके बावजूद भी अगर द्रमुक विरोध में रहती है तो सदन में मतदान से सपा के दूर रहने के बाद दो तिहाई का आंकड़ा ३३३ होगा तब भी सरकार एनपीसी से समर्थन प्राप्त कर जरूरी आंकड़ा प्राप्त कर सकती है ऐसा जानकारों का मानना है होगा क्या यह तो अभी नहीं कहा जा सकता मगर देश की लगभग आधी आबादी जो सरकार बनाने और गिराने में महत्वपूर्ण भूमिका में रहती है मुझे लगता है कि इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए कोई भी जनमानस के समर्थन वाला दल इसका विरोध खुलकर नहीं करेगा और करता भी है तो हर दल में पहला सांसद भी है जो कहे अनकहे रूप में हर प्रकार की राजनीति में अन्य कार्यों में अपनी हिस्सेदारी प्राप्तकरने का मौका न चूकें कई बार ऐसा हुआ है कि जब महिलाओं से संबंध कोई मुद्दा हुआ तो हर महिला सांसद एक साथ खड़ी नजर आई देखा जाये तो यह विरोध का मुद्दा नजर नहीं आता क्योंकि हर दल कभी ना कभी सीधे सीधे या घुमा फिराकर इस बात का समर्थक करता रहा है कांग्रेस की प्रमुख महिला नेता और वर्तमान में सांसद प्रियंका गांधी पूर्व में यूपी विधानसभा चुनावों में यूपी के महिलाओं को ४० प्रतिशत टिकट देने की बात कर चुकी है और अबअगर महिला आरक्षण का मुद्दा आता है तो खुलकर विरोध नहीं कर सकेंगी अब अगर देश के सबसे बड़े दूसरे नंबर के राजनीतिक दल कांग्रेस पार्टी को भी अगर स्वतंत्रता के बाद का पहला नंबर प्राप्त करना है तो २०२९ के लोकसभा चुनाव को ध्यान में रखते हुए शायद महिलाओं के आरक्षण की बात का खुलकर विरोध ना किया जाए क्योंकि लोकसभा में इसके नेता सांसद राहुल गांधी चुनावों में जनसमर्थन के लिए हर वह मुद्दा उठा रहे जो जोआम मतदाता की भावनासे जुड़ा है जैसा की पूर्व में कई मुद्दों को लेकर तथ्य परक विरोध करते रहे है अगर वह महिला आरक्षण कोलेकर कोई ऐसा बिन्दु निकाल ले जिससे सभी दलों के सांसद इससे सहमत हों तो बात और है।
(प्रस्तुतिः- रवि कुमार बिश्नोई संपादक दैनिक केसर खुशबू टाइम्स मेरठ)
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