लखनऊ, 22 जून (ता)। उत्तर प्रदेश सरकार की योजना है कि ड्राइविंग लाइसेंस की प्रक्रिया को पासपोर्ट सिस्टम की तरह बनाया जाए, जिसमें हर चरण का रिकॉर्ड आनलाइन और वेरिफाइड हो। जिस तरह पासपोर्ट बनवाने में पुलिस वेरिफिकेशन और बायोमेट्रिक जांच जरूरी होती है, उसी तरह अब डीएल प्रक्रिया में भी कठोर परीक्षण और सत्यापन लागू किए जाएंगे।
इस नई व्यवस्था को लागू करने की दिशा में शुरुआती काम शुरू कर दिया है। विभागीय अधिकारियों के अनुसार मौजूदा सिस्टम में सुधार कर उसे अधिक सुरक्षित और टेस्ट-आधारित बनाया जाएगा। अभी तक ड्राइविंग टेस्ट और बायोमेट्रिक प्रक्रिया सीमित रूप से आरटीओ स्तर पर होती है, लेकिन नए सिस्टम में इसे और अधिक संरचित किया जाएगा। नई व्यवस्था में एक अहम पहलू यह भी है कि ड्राइविंग टेस्ट और कुछ प्रक्रियाओं को निजी एजेंसियों के माध्यम से संचालित करने पर विचार किया जा रहा है। इससे प्रक्रिया को तेज और तकनीकी रूप से मजबूत बनाने की उम्मीद है, हालांकि इस पर अंतिम निर्णय अभी लिया जाना बाकी है।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस नई व्यवस्था को लागू करना आसान नहीं होगा। मौजूदा ढांचे में निजी और सरकारी भागीदारी का संतुलन बनाना एक बड़ी चुनौती हो सकता है। इसके अलावा ग्रामीण क्षेत्रों में डिजिटल और टेस्टिंग इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत करना भी जरूरी होगा, ताकि हर आवेदक को समान अवसर मिल सके। नई प्रस्तावित व्यवस्था लागू होने के बाद उत्तर प्रदेश में ड्राइविंग लाइसेंस केवल एक दस्तावेज नहीं बल्कि जिम्मेदारी का प्रमाण बन जाएगा। सरकार का दावा है कि इससे सड़क दुर्घटनाओं में कमी आएगी और केवल प्रशिक्षित चालक ही सड़कों पर उतरेंगे।
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