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    Home»टेक्नोलॉजी»‘एआई पीकोकिंग’ रणनीति कम, प्रदर्शन ज्यादा?
    टेक्नोलॉजी

    ‘एआई पीकोकिंग’ रणनीति कम, प्रदर्शन ज्यादा?

    adminBy adminJanuary 22, 2026No Comments1 Views
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    नई दिल्ली, 22 जनवरी। अमेरिका का रक्षा विभाग (पेंटागन) खुद को दुनिया की सबसे ताकतवर एआई-सक्षम सेना बनाने के लिए नई एआई एक्सीलेरेशन स्ट्रैटेजी लेकर आया है। इस रणनीति का उद्देश्य सेना में एआई को तेजी से अपनाना, एआई इंफ्रास्ट्रक्चर में निवेश बढ़ाना और बड़े पैमाने पर एआई-पावर्ड सैन्य प्रोजेक्ट्स शुरू करना है। रणनीति में दावा किया गया है कि एआई की मदद से सैन्य खुफिया जानकारी को वर्षों नहीं, घंटों में श्हथियारश् बनाया जा सकेगा, जिससे टारगेटिंग और फैसले लेने की प्रक्रिया बहुत तेज हो जाएगी। वहीं आलोचकों का मानना है कि यह रणनीति कहीं न कहीं ‘एआई पीकोकिंग’ यानी तकनीकी ताकत का दिखावा ज्यादा और ठोस रोडमैप कम है।
    अमेरिका अपने रक्षा विभाग के जरिए खुद को दुनिया की सबसे ताकतवर श्एआई-सक्षम सेनाश् बनाने की तैयारी कर रहा है। अमेरिका के रक्षा विभाग ने इसी महीने ‘एआई एक्सीलेरेशन स्ट्रैटेजी’ नाम की नई रणनीति जारी की है। इसका लक्ष्य अमेरिकी सेना को आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) के इस्तेमाल में सबसे आगे रखना है। हालांकि, कई जानकार इसे लेकर चिंतित भी हैं। उनका मानना है कि अमेरिका एआई की कमियों को नजरअंदाज कर रहा है और यह सिर्फ ‘एआई पीकोकिंग’ (दिखावा) है, यानी अमेरिका हकीकत से ज्यादा अपनी तकनीकी ताकत का शोर मचा रहा है।
    ‘एआई पीकोकिंग’ एक नया कॉर्पाेरेट शब्द है जो कार्यस्थल पर कर्मचारियों के उस व्यवहार को दर्शाता है, जिसमें वे अपनी एआई क्षमताओं और ज्ञान का दिखावा करते हैं। ताकि वे दूसरों से ज्यादा स्मार्ट और तकनीकी रूप से उन्नत दिख सकें। आसान भाषा में कहें तो जिस तरह मोर अपने पंख फैलाकर ध्यान आकर्षित करता है, उसी तरह कर्मचारी एआई टूल के अपने थोड़े-बहुत ज्ञान का उपयोग अपनी प्रतिष्ठा बढ़ाने के लिए करते हैं।
    आज चीन और इजरायल जैसे देश पहले से सैन्य कामों में एआई का इस्तेमाल बढ़ा रहे हैं। अमेरिका की रणनीति अलग इसलिए है क्योंकि यह पूरी तरह एआई-फर्स्ट सोच पर टिकी है। इसमें कहा गया है कि एआई के जरिए अमेरिकी सेना ज्यादा तेज, कुशल और घातक बनेगी। इसके लिए रणनीति में सेना में एआई मॉडल्स पर ज्यादा प्रयोग, एआई अपनाने में आने वाली दफ्तरशाही रुकावटें हटाना, एआई इंफ्रास्ट्रक्चर में निवेश और बड़े स्तर पर एआई-पावर्ड सैन्य प्रोजेक्ट्स शुरू करना शामिल हैं।
    इस रणनीति का एक बड़ा दावा है कि एआई की मदद से सैन्य खुफिया जानकारी को वर्षों नहीं, घंटों में हथियार बनाया जाएगा। यानी टारगेट चुनने, फैसला लेने और हमला करने की प्रक्रिया को बहुत तेज हो जाएगी। यहीं से चिंता बढ़ती है। दुनिया में पहले भी ऐसे मामले सामने आए हैं जहां एआई आधारित फैसलों से नागरिकों के नुकसान का खतरा बढ़ गया। उदाहरण के तौर पर गाजा में इजरायली सेना के एआई-आधारित डिसीजन सपोर्ट सिस्टम को लेकर रिपोर्ट्स आती रही हैं कि टारगेटिंग की रफ्तार और पैमाना बढ़ने से नागरिक क्षति का जोखिम भी बढ़ा है। अगर अमेरिका इस प्रक्रिया को और तेज करेगा तो संघर्ष जल्दी भड़क सकता है और आम लोगों का नुकसान बढ़ सकता है।
    रणनीति का दूसरा बड़ा कदम और भी चौंकाने वाला है। इसमें कहा गया है कि सैन्य इस्तेमाल के लिए बने एआई मॉडल्स को 30 लाख नागरिक और सैन्य कर्मियों तक, श्हर वर्गीकरण स्तरश् पर पहुंचाया जाएगा। इससे कई सवाल उठते हैं। जैसे- 30 लाख नागरिकों को सैन्य एआई सिस्टम की जरूरत क्यों होगी? इतनी बड़ी संख्या में तकनीक फैलने से लीक या गलत इस्तेमाल का खतरा कितना बढ़ेगा? और क्या इससे सैन्य क्षमता का हिस्सा आम लोगों तक पहुंच जाएगा? रणनीति इन सवालों का साफ जवाब नहीं देती।
    आजकल एआई को अक्सर ऐसा दिखाया जाता है जैसे यह हर समस्या का जादुई इलाज हो। लेकिन सच यह है कि इसकी कई सीमाएं हैं। एक डप्ज् की स्टडी का हवाला दिया जाता है, जिसमें कहा गया कि 95ः संगठनों को जनरेटिव एआई से निवेश के बदले कोई खास फायदा नहीं मिला। इसकी बड़ी वजह यह थी कि एआई टूल्स में कई तकनीकी कमियां होती हैं। जैसे- यह लंबे समय तक चीजें सही तरह याद नहीं रख पाता, नए हालात या नए संदर्भ में खुद को ठीक से ढाल नहीं पाता और समय के साथ अपने आप बेहतर नहीं बनता। यह स्टडी बिजनेस पर थी लेकिन इससे मिलने वाली सीख साफ है, अक्सर एआई की कमियां मार्केटिंग के शोर में छिप जाती हैं।
    एआई एक चीज नहीं, कई तकनीकों का समूह है
    एआई कोई एक मशीन नहीं है। यह कई अलग-अलग तकनीकों का छाता शब्द है, जैसे लार्ज लैंग्वेज मॉडल, कंप्यूटर विजन सिस्टम और डिसीजन-सपोर्ट सिस्टम। इन सबकी क्षमता, उपयोग और भरोसेमंदी अलग-अलग होती है। लेकिन प्रचार में इन्हें ऐसे दिखाया जाता है जैसे एआई हर समस्या का एक ही समाधान है। यह माहौल कुछ हद तक डॉटकॉम बबल जैसा लगता है, जहां मार्केटिंग ज्यादा थी और असल मजबूती कम।
    आलोचकों का मानना है कि रक्षा विभाग की यह रणनीति असली तकनीकी रोडमैप से ज्यादा दिखावा लगती है। यानी एआई को हर समस्या का हल बताना कि पीछे रह जाने का डर दिखाना, सीमाओं और जोखिमों पर कम बात करना। लेकिन युद्ध में एआई की छोटी गलती भी भारी पड़ सकती है। अगर सिस्टम गलत लक्ष्य पहचान ले, गलत डाटा पर फैसला करे या भ्रमित निष्कर्ष दे दे, तो नतीजा सिर्फ नुकसान नहीं बल्कि जानलेवा त्रासदी हो सकता है।

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