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    Home»देश»गांव हो या देहात हर जगह महिलाएं हमेशा तरक्की की ओर अग्रसर रही हैं, दिल्ली की दरोगा को लेकर सबके बारे में एक राय कायम करना उचित नहीं
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    गांव हो या देहात हर जगह महिलाएं हमेशा तरक्की की ओर अग्रसर रही हैं, दिल्ली की दरोगा को लेकर सबके बारे में एक राय कायम करना उचित नहीं

    adminBy adminMarch 6, 2026No Comments14 Views
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    वर्तमान में दुनिया की आधी आबादी मातृशक्ति महिलाओं का दखल आज ही नहीं हमेशा हर काम में रहा है। मौका मिलने पर चाहे वह अमीर परिवार की हो या गरीब अथवा शहरी क्षेत्र की हो या ग्रामीण परिवेश की अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाने के साथ अपनी कामयाबी का झंडा फहराने में लगी हैं। इसके उदाहरण के रुप में हम दिल्ली में पढ़ी भारत की पहली महिला रेडियोलोजिस्ट एवं एम्स की डायरेक्टर रहीं स्नेहा भार्गव व यूपी के सुल्तानपुर जिले के कुडवार ब्लाक के गांव हरकपुर निवासी रजनीबाला के कार्य को देखकर अंदाजा लगा सकते हैं। बीते दिनों मेरठ बागपत हाईवे पर डोलचा निवासी दिल्ली पुलिस की महिला दारोगा रिंकी यादव द्वारा कार सवारों पर सोने की चेन और अंगुठी लूटने की लिखाई एफआईआर फर्जी निकलने पर एक सज्जन द्वारा टिप्पणी की गई कि दारोगा को क्या हो गया जो वह फर्जी रिपोर्ट लिखाने चली। आखिर देश को यह कहां ले जाना चाहती हैं। मेरे द्वारा उन सज्जन को बताया गया कि एक बात को देख सुनकर किसी के बारे में कोई विचार नहीं बनाए जाने चाहिए खासकर पूरे वर्ग पर तो अंगुली उठानी ही नहीं चाहिए।
    दिल्ली के प्रतिष्ठित परिवार में पली बढ़ी प्रसिद्ध लेडी हॉडिंग मेडिकल कालेज की डायरेक्टर बनी स्नेहा भार्गव की पढ़ाई अपने देश और लंदन में हुई और उन्होंने जो सफलता के झंडे गाड़े उसके लिए भारत सरकार ने उन्हें १९९१ में सर्वोच्च नागरिक सम्मान पदमश्री से नवाजा और चिकित्सा के क्षेत्र में बड़ा पुरस्कार डॉ वीसी राय सम्मान भी मिला। इसके अलावा राष्ट्रीय अंतररराष्ट्रीय स्तर पर उन्होंने कई सम्मान पुरस्कार प्राप्त किए।
    यूपी के सुल्तानपुर जिले के कुडवार ब्लाक के गांव हरकपुर निवासी रजनीबाला भी महिला प्रगृति और देश के लिए कुछ करने के मामले में एक उदाहरण हैं। वह वर्तमान में मूंज के उत्पादों से सिखलुल्ला भोका डोरी डोलची और कब जैसी कलाकृतियों को बढ़ावा देकर अपनी एक अलग पहचान बना रही हैं। रजनीबाला १२वीं तक की पढ़ी हैं। और मंूज शिल्पकला का हुनर उन्हें अपनी मां से मिला था। बचपन से उन्होंने इस कार्य को आत्मसात किया। नई सीख से उन्होंने अनेक प्रकार की वस्तुएं बनाकर अन्य ग्रामीण महिलाओं को आगे बढ़ने की प्रेरणा दी। दिल्ली की एक निजी कंपनी में कैब चलाने वाले पति को हर काम में सहयोग देने के साथ ही वो अपने बेटे को लखनऊ मेडिकल कॉलेज में पढ़ाई करा रही है और बेटी सुल्तानपुर विद्यालय में अध्ययनरत हैं। इन्हें व्यापार का पूरा ज्ञान है क्योंकि मुंूज की कीमत इनके द्वारा अलग अलग तय की गई है। उनका कहना है कि औसतन हर उत्पादन पर ५० प्रतिशत लाभ हो जाता है। क्योंकि १०० रुपये किसी उत्पादन में लगे तो बाजार में १५० रुपये उसका मूल्य होता है। करीब १०० महिलाओं को रोजगार का अवसर देने वाली रजनीबाला के काम से प्रभावित होकर अन्य प्रदेशों में भी महिलाएं इस क्षेत्र में सक्रिय हो रही हैं।
    कहने का आश्य है कि किसी एक व्यक्ति को लेकर किसी के बारे में भी राय नहीं बनाई जा सकती। वो जमाना लद गया कि एक मछली तालाब को गंदा करती थी। अब प्रगूति और सोशल मीडिया का जमाना है। कमियों के साथ उपलब्धियां भी रफ्तार के साथ दौड़ती है और दुनियाभर में घूमती हैं। महिला दरोगा को फर्जी लूट के आरोप लगाकर रिपोर्ट दर्ज नहीं करानी चाहिए थी। इसलिए आप किसी भी वर्ग को एक निगाह से नहीं देख सकते। मेरा मानना है कि जब हम एक अंगुली किसी की तरफ उठाते हैं तो दो हमारी तरफ उठती हैं। इसलिए अच्छे कामों को ज्यादा देखिये क्योंकि निंदक धोरे राखिये वाली कहावत अब नहीं चलती।
    (प्रस्तुतिः- रवि कुमार बिश्नोई संपादक दैनिक केसर खुशबू टाइम्स मेरठ)

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