केंद्र हो या प्रदेश सरकारें सब ही मन से यह चाहती है कि हर नागरिक शिक्षित बनें चाहे वह बच्चा हो या जवान। पिछले दो दशक से जो दिखाई दे रहा है उससे यह बात साफ भी हो रही है कि इस बारे में काम भी होता नजर आ रहा है। परिणामस्वरूप कम या ज्यादा साक्षरता दर में बढ़ोत्तरी होने की चर्चाएं सुनने को मिल रही हैं। लेकिन इस बात से भी इनकार नहीं कर सकते कि शिक्षा के मंदिरों को दुकान बनाकर चलने वाले माफियाओं के द्वारा इस क्षेत्र में सभी नियमों नीतियों को ताक पर रखकर अभिभावकों की मंशा को भापकर इनके द्वारा उनका विभिन्न तरीकों से आर्थिक शोषण किया जा रहा है। लेकिन यह सहारा नजर आता है कि सरकार आर्थिक रूप से कमजोंरों को भी शिक्षा देने का मौका दे रही है। मगर एक खबर के अनुसार यूपी में अब सामान्य व ओबीसी के छात्रों को बीएड का आवेदन जो पहले २५० रुपये में होता था अब १६५० रुपये देने पड़ेंगे। अगर सामान्य रुप से सोचें तो यह कोई बड़ी बात नहीं है लेकिन काउंसिलिंग की फीस भी १०० रुपये और आवेदन की १४०० रुपये बढ़ाया जाना गरीबी रेखा के आसपास जीने वाले युवाओं व परिवारों पर आर्थिक बोझ डाल सकती है। जनहित में और गरीब आदमी की व्यवस्था को ध्यान में रखकर प्रदेश के शिक्षा विभाग को पीएम व सीएम यह निर्देश दें कि पढ़कर आगे बढ़ने और अपना भविष्य बनाने के इच्छ़ुक आर्थिक रूप से कमजोर छात्रों को देखते हुए यह बढ़ोत्तरी वापस ली जाए और अगर खर्च ज्यादा बढ़ गए हैं तो उच्च शिक्षण संस्थानों व एडेड स्कूलों को दी जाने वाली सहायता कैसे खर्च हो रही है उसकी जांच कराकर कटौती की जाए मगर बच्चों पर फीस ना ही बढ़ाई जाए तो देशहित में होगा क्योंकि इनमें से कुछ नौजवान आगे जाकर देश के विकास और उन्नति में अपनी भूमिका निभाएंगे। यह हम सबको सोचना और समझना ही होगा।
(प्रस्तुतिः- रवि कुमार बिश्नोई संपादक दैनिक केसर खुशबू टाइम्स मेरठ)
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