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    Home»देश»पाक में रहमान गली हुई राम गली और बाबरी चौक बना जैन मंदिर रोड
    देश

    पाक में रहमान गली हुई राम गली और बाबरी चौक बना जैन मंदिर रोड

    adminBy adminMay 20, 2026No Comments6 Views
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    लाहौर 20 मई। जरा सोचिए आप पाकिस्तान के लाहौर की किसी सड़क पर चल रहे हैं और अचानक आपको बोर्ड पर दिखता है- कृष्ण नगर, जैन मंदिर रोड तो आप चौंक जाएंगे न! आजकल शहर की सड़कों, चौराहों से दशकों पुराने इस्लामी और पाकिस्तानी नामों को हटाकर, उन्हें उनके मूल हिंदू, सिख, जैन और औपनिवेशिक नाम वापस दिए जा रहे हैं।

    पिछले करीब दो महीनों में कम से कम नौ प्रमुख स्थानों के नाम बदले जा चुके हैं। प्रशासन के आधिकारिक साइन बोर्ड्स पर अब ‘इस्लामपुरा’ की जगह ‘कृष्ण नगर’ लिख दिया गया है। इसी तरह ‘बाबरी मस्जिद चौक’ अब फिर से ‘जैन मंदिर चौक’ और ‘रहमान गली’ को उसका पुराना नाम ‘राम गली’ वापस दे दिया गया है। पंजाब सरकार के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि मुख्यमंत्री मरियम नवाज की अध्यक्षता में हुई कैबिनेट बैठक में इस ऐतिहासिक फैसले को हरी झंडी दी गई। पाक के पंजाब सरकार का यह नाम बदलने का अभियान ‘लाहौर हेरिटेज एरिया रिवाइवल’ परियोजना का हिस्सा है, जिसका उद्देश्य लाहौर को उसकी विभाजन पूर्व विरासत और पहचान से दोबारा जोड़ना है।

    पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ का यह एक महत्वाकांक्षी ड्रीम प्रोजेक्ट है, जिसकी लागत 50 अरब पाकिस्तानी रुपया है। इसका मकसद दशकों की अनदेखी, बेतरतीब शहरीकरण और वैचारिक रूप से इतिहास को बदलने की कोशिशों के बाद शहर की वास्तुकला और सांस्कृतिक ताने-बाने को फिर से संवारना है।

    पाकिस्तान पंजाब प्रांत की इस समय मुख्यमंत्री नवाज शरीफ की बेटी मरियम नवाज हैं। इन नामों को बदलने की शुरुआत वे 2025 से ही कर चुकी हैं। अपने पिता के ड्रीम प्रोजेक्ट को पूरा करने के लिए मरियम सड़कों के नाम बदलकर ऐतिहासिक विरासत को वापस लाना चाहती हैं।

    पंजाब सरकार का तर्क है कि यूरोपीय देशों की तरह, पाकिस्तान को भी अपने शहरों की ऐतिहासिक विरासत को मिटाने के बजाय उसे सहेजकर रखना चाहिए। इस पहल का एक मुख्य मकसद विरासत पर्यटन को बढ़ावा देना है, जिससे सरकार के लिए राजस्व भी पैदा हो सके।

    नाम बदलने के पीछे का असली कारण
    भारत-पाकिस्तान विभाजन के बाद से ही पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों खासकर हिंदुओं और सिखों की दुर्दशा एक गंभीर चिंता का विषय रही है। इतिहास गवाह है कि पाकिस्तान से हिंदू और सिखों के साथ उत्पीड़न, जबरन धर्मांतरण, उनकी संपत्तियों पर कब्जा और ऐतिहासिक मंदिरों को ढहाने जैसी कई घटनाएं सामने आती रही हैं।

    वहीं अब मरियम नवाज के फैसले के बाद हैरानी की बात यह भी है कि दशकों से इस्लामीकरण की प्रक्रिया से बने इस देश में, नाम बदलने का यह अभियान बिना किसी विरोध के आगे बढ़ रहा है।

    इसके पीछे का कारण ये देखा जा सकता है कि पुराने नामों को बहाल करके पाकिस्तान वैश्विक समुदाय विशेष रूप से पश्चिमी देशों को यह दिखाना चाहता है कि वह अपनी ‘कट्टरपंथी छवि’ को छोड़कर एक सहिष्णु, समावेशी और बहुसांस्कृतिक राष्ट्र के रूप में विकसित हो रहा है, जिससे उसे कूटनीतिक और आर्थिक सहायता प्राप्त करने में आसानी हो।

    आतंकवाद के वित्तपोषण के आरोपों को लेकर पाकिस्तान लंबे समय से अंतरराष्ट्रीय जांच के घेरे में रहा है, जिससे उसकी अर्थव्यवस्था को अरबों डॉलर का नुकसान हुआ है।

    लाहौर जैसे प्रमुख सांस्कृतिक केंद्र में औपनिवेशिक काल के नामों को बहाल करके, इन जगहों को पुराने हिंदू और सिख समुदाय से जुड़े नाम देकर पाकिस्तान अपनी एक अलग ऐसी छवि बनाना चाहता है जिससे यह लगे कि वह उग्रवाद को पीछे छोड़ रहा है।

    पाकिस्तान की पंजाब सरकार का यह कदम इनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स (FATF) या अन्य वैश्विक संस्थानों को उस पर फिर से कड़े प्रतिबंध लगाने से रोकना भी माना जा सकता है।

    इस्लामाबाद अपने अस्तित्व के लिए पूरी तरह से अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) के बेलआउट पैकेज पर भी निर्भर है। IMF न केवल आर्थिक आंकड़ों की जांच करता है, बल्कि किसी देश की राजनीतिक स्थिरता और सामाजिक माहौल पर भी पैनी नजर रखता है।

    पाकिस्तान में नाम बदलने का यह दिखावा विदेशी निवेशकों और IMF को भी यह भरोसा दिला सकता है कि यह देश निवेश के लिए एक सुरक्षित जगह है और IMF के लिए यहां निवेश करना कोई गलती नहीं होगी।

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