कोई उपलब्धि और काबलियत किसी को शिष्य बनाने की पूर्ण रूप से ना होने के बाद भी कुछ लोग जो समाज के विभिन्न क्षेत्रों में सक्रिय हो सकते है अपने आप को श्रेष्ठ दर्शाने हेतु समय असमय लम्बी लम्बी हाकने और पूर्ण रूप से कुछ पता न होने के बाद भी बड़ी बड़ी बात करने की मानसिकता से बाहर नहीं निकल पाते है। ऐसा क्यों है यह तो वहीं जाने। लेकिन सबको बोलते या लिखते अथवा कुछ करते समय भले ही दूसरे के सामने कुछ भी करते हो मगर उस समय अपने आपको अपनी असलियत जानकर कुछ बोलना और लिखना चाहिए। तभी समाज में आपसे प्यार करने वाले और हर जगह आपको आगे लाने की कोशिश करने वाले आपसे महत्वपूर्ण या आपके सहयोगी कुछ ऐसा करने का सोच सकते है जिससे आपका महिमा मंडन होता रहे।
वर्तमान समय में ना तो भगवान राम के भक्त हनुमान जैसा वक्त आसानी से मिल पाएगा और ना ही गुरू द्रोर्णाचार्य और गुरू विश्वामित्र जैसे गुरू मिलेगें तो एकलव्य जैसे शिष्य भी अब मिलना मुश्किल है जो बिना कुछ सिखे ही दूर खड़े होकर ही अपनी सोच के अनुसार गुरू द्वारा औरों को कुछ सिखाने की बात को आत्मसात कर एकलव्य बन जाए। ऐसा कोई बिरला ही कहीं मिल सकता है। जहां तक इस मुद्दे पर मैं समझता हूं कि सबको अपनी असलियत पहचानकर दूसरों को बिना किसी मतलब के शिष्य या चेला बताने की कोशिश नहीं करनी चाहिए क्योंकि ऐसे मामलों में कई बार सबके बीच सामूहिक रूप से हंसी का पात्र बन सकते है और आपकी इज्जत उतर जाती हैं।
हां अगर आप कुछ लोगों को पसंद करते है या उनकी उपलब्धियां अथवा काबलियत का सम्मान करते है और वो आपसे छोटे भी है तो आप उन्हें सार्वजनिक रूप से चाहे परिवार में हो या सभाओं में पान की दुकान पर हो या गांव की चौपाल पर आपकी श्रेष्ठता भी बनी रहे दूसरे का सम्मान भी इसलिए उसे अपना भतीजा या पुत्र समान अथवा बड़ा काबिल बच्चा है और इस फलां क्षेत्र में बड़ी उपलब्धि प्राप्त की इससे औरों को भी सीखना चाहिए। ऐसे शब्दों से आप अपना और सामने वाले दोनों का सम्मान और आपस में घनिष्ठता को बढ़ावा देकर एक ग्रामीण कहावत वो कब शुरू हुई किसने और क्यों की यह तो मैं सही प्रकार से नहीं जानता हूं मगर तू मुझे पंत कहे मैं तूझे निराला हम दोनों का हर क्षेत्र में चलता रहेगा घोटाला। नही ंतो जिसे आप अपना शिष्य बताने की कोशिश कर रहे है वो आगे बढ़कर अपनी काबलियत और सफलता का मार्ग प्रस्त करता रहेगा लेकिन आप फिल्मी गाने में अकेला ही चलता था लोग जुड़ते चले गये काफिला बनता गया पर खरा ना उतरकर अकेले ही अपना महिमा मंडन और काल्पनिक सम्मान की अनुभूति में भटकते ही रहेंगे। कहने का आशय सिर्फ इतना है कि हमें हर समय अपने काम में मजबूत और सफलता प्राप्त करने हेतु चाहे कोई अपने से बड़ा हो या छोटा गरीब हो या अमीर काबिल हो या बुद्धिहीन सबको ही उसकी सामर्थ के अनुसार संबोधन कर अपने आप की वाह वाही प्राप्त करते रहना चाहिए शायद यह जीवन में सफलता का बड़ा मूल मंत्र भी कह सकते हैं। आप किसी भी क्षेत्र में सक्रिय हो यह बात विश्वास से कह सकता हूं कि अगर आप शब्दों का चयन और बोलने में गरिमा समाये रहेंगे तो आपका परचम चारों तरफ फहराता रहेगा।
(प्रस्तुतिः- अंकित बिश्नोई राष्ट्रीय महामंत्री सोशल मीडिया एसोसिएशन एसएमए पूर्व सदस्य मजीठिया बोर्ड यूपी संपादक पत्रकार)

