प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी के भ्रष्टाचार मुक्त समाज की स्थापना के लिए भरपूर प्रयास किए जाने के बावजूद ज्यादातर भ्रष्टाचारियों के खिलाफ कोई कार्रवाई समय से नहीं की जा रही ऐसा लगता है। इस मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट के आदेश में न्यायमूति समीर जैन ने सुरेश प्रकाश गौतम की जमानत याचिका को स्वीकार करते हुए कहा कि भ्रष्टाचार निवारण मामलों की जांच में घोर लापरवाही हो रही है। इस संबंध में कई मामलों का जिक्र भी अदालत ने किया। जो इस बात का प्रतीक है कि कहीं ना कहीं तो समाज हित में ऐसे मामलों में जिस स्तर पर कार्रवाई होनी चाहिए वो नहीं हो रही है ऐसा मैं इसलिए कह रहा हूं कि सरकारी कार्यालयों में सबको यह पता होने के बावजूद कि जो विकास कार्य सफाई और अन्य कार्यों के लिए सरकार बजट दे रही है भले ही विभागों के अफसर यह कहें कि उनके यहां ईमानदारी से कार्य हो रहे हैं मगर सही यह है कि बजट की बंदरबाट और बिना काम के भुगतान या घटिया होने के बाद भी ठेकेदारों को भुगतान हो रहे हैं। जानकारों का कहना है कि ज्यादातर अफसर अपने कमीशन के चक्कर में भुगतान करने या घटिया काम होने के संबंध में पत्रावली को गायब करने में भी भूमिका निभा रहे लगते हैं। मुझे लगता है कि सरकार अगर प्रदेश और देश में अधिकारियों से लापरवाही भ्रष्टाचार और बजट के गलत उपयोग के कितने प्रकरण लंबित है उनकी सूची मंगाई जाए और ना भेजने वालों पर कार्रवाई हो तो यह पक्का है कि हर मामले में भ्रष्टाचार और लापरवाही कम हो सकती है। आम आदमी जिन वस्तुओं का अभाव महसूस कर रहा है वो उसे आसानी से मिल सकती है और पर्यावरण में सुधार होने की बात कही जा सकती है। हर क्षेत्र में भ्रष्टों पर कार्रवाई होने से सुधार हो सकता है। अदालत द्वारा इस बिंदु पर सवाल उठाकर अच्छा उदाहरण प्रस्तुत किया गया है। अगर उस पर कार्रवाई हो जाए तो उसके कितने लाभ आम आदमी को होंगे यह शब्दों में बखान नहीं किया जा सकता। इसलिए सरकार जनहित में भ्रष्ट अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर अंकुश लगाने हेतु कार्रवाई करे।
(प्रस्तुतिः- रवि कुमार बिश्नोई संपादक दैनिक केसर खुशबू टाइम्स मेरठ)
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