देश में जब भी कोई आपदी त्रासदी होती है तो सब जगह बवाल मचता है और आग या अन्य कारणों की खोज का सिलसिला हर जिले में शुरु हो जाता है। बड़े लोग श्रद्धांजलि देने में लग जाते हैं तो कुछ मोमबत्ती मार्च निकालते हैं। मगर क्या मुआवजे शोक संवेदना से आकस्मिक आपदा की यह घटनाएं रुक सकती है। तो जवाब है कि कोई अलादीन का चिराग तो है नहीं जो जिन इन अवैध निर्माणों के खिलाफ कार्रवाई करेगा। जो कार्रवाई शुरु होती है वो अंधेर नगरी चौपट राजा के समान ऐसे मामलों में इशारा करती है। लेकिन क्या इन सांत्वना भरे शब्दों और आंसू बहाने से ऐसा रुकने वाला है। तो मुझे नहीं लगता है कि ऐसा हो सकता है। जब तक घटनाओं वाली इमारतों के गलत निर्माण के लिए जिम्मेदार विभाग के अधिकारियों को सजा नहीं मिलेगी तब तक ना आग की घटनाओं पर रोक लगेगी ना अन्य आपदाएं कम हो पाएंगी। प्रदेश की राजधानी लखनऊ के अलीगंज जैसे इलाके में स्थित चार मंजिला इमारत में आग लग गई। इस रिहायशी इलाके में अवैध रुप से तीन मंजिला इमारत कैसे बनी और सुरक्षा के इंतजाम क्यों नहीं थे। पुलिस अधिकारी कह रहे हैं कि इमारत के मालिक और कोचिंग के संचालक को गिरफ्तार कर लिया है। सीएम योगी आदित्यनाथ सभी कार्यक्रम छोड़ लखनऊ पहुंच गए और घटनास्थल का दौरा भी किया। आग लगने का कारण शॉर्ट सर्किट बताया जा रहा है तो लेकिन अगर बाहर निकलने के रास्ते होते तो कमरे में फंसे कई लोग बच सकते थे। शुरुआती दौर में जब यह बनते हैं तो ज्यादातर को अपनी जेब भरने की चिंता रहती है तो ऐसी घटनाएं कैसे रुक सकती है। पहले तो शहरों में ऐसा होता था लेकिन अब गांवों में भी ऐसा होने लगा है। कई उद्योगपति अब शहरों के बाहर अवैध इमारतें, कॉलोनियां बना रहे हैं और उद्योगों का गंदा पानी जमीन में डाल रहे हैँ। इसे रोकने वाले जानते हैं मगर कार्रवाई क्यों नहीं करते यह किसी को बताने की आवश्यकता नहीं है। अपने बच्चों को अच्छी पढ़ाई कराकर उन्हें खुशी से जीने के दृष्टिकोण से इन अवैध इमारतों में चल रहे कोचिंग सेंटरों में बच्चों को भेजते हैं और मोटी फीस देते हैं। जिसके बाद यह अमीर बनते जा रहे हैं और हम ऐसी घटनाओं में अपनों को खोते जा रहे हैं। स्मरण रहे कि कुछ दिन पहले दिल्ली के एक होटल में आग की घटना में काफी लोग मारे गए। उससे पहले दिल्ली के एक बेसमेंट में पानी भरने से कोचिंग के बच्चे जान से हाथ धो बैठे थे। इन घटनाओं के बाद देशभर में जांच शुरु हुई मगर सब ढाक के तीन पात ही होकर रह गई। अकेले लखनऊ में ४३८ कोचिंग सेंटर, मेरठ में १५०० कोचिंग सेंटर चल रहे हैँ जिनमें से १०० से ज्यादा बेसमेंट बताए जा रहे हैं लेकिन तमाम शिकायतों के बाद भी ना तो फायर, बिजली विकास प्राधिकरण नगर निगम के अफसर इस ओर कार्रवाई नहीं करते। हरियाणा के दबावली में आग से ३०० से ज्यादा बच्चों की मौत जैसी घटनाएं हर साल घट रही हैं। रुकने की बजाय इनमें बढ़ोत्तरी ही हो रही है आखिर क्यों। पीएम ने २ लाख, घायलों को ५०-५० हजार तथा सीएम योगी ने मृतकों के परिजनों को पांच पांच लाख और घायलों को ५०-५० हजार रुपये देने की घोषणा की है। इससे अपनों को खोने का दुख तो खत्म नहीं होगा। इस हादसे में मारे गए युवा आगे चलकर देश के विकास और परिवार को चलाने में अपनी भूमिका निभाते। आश्चर्य इस बात का है कि लगभग ४० बच्चे स्टूडियो व कोचिंग में रोज आते थे लेकिन व हां ना स्मॉग डिटेक्टर थे ना फायर सिलेंडर। मुख्यमंत्री जी अब समय आ गया है कि खतरनाक इमारतों के खिलाफ सख्त कार्रवाई हो। पत्रावली खंगालने और कार्रवाई होगी से कुछ होने वाला नहीं है। अग्नि सुरक्षा की खामियों के लिए फायर सर्विस के लोगों को कार्रवाई की जद में लिया जाए। एसआईटी जांच करेगी। चार अधिकारी निलंबित कर दिए गए। वोल्गा बार क्लब में कुछ माह पहले लगी आग में पकड़े गए दोनों मालिक कुछ दिनों बाद बाहर आ गए। अगर सही पैरवी और जांच नहीं हुई तो इस घटना के जिम्मेदार भी देर सवेर बाहर आ जाएंगे। दिल्ली के उपहार कांड भी कई सालों तक चला। जब कार्रवाई हुई तो ज्यादातर पीड़ित नहीं रहे। पाठकों को ध्यान होगा कि महाभारत में लाक्षागृह की चर्चा होती है। पांडवों का अंत करने के लिए कौरवों ने बागपत के बरनावा में लाक्षागृह का निर्माण कराया और पांडवों के अंत की कोशिश हुई लेकिन पहले से आभास होने के चलते वह वहां से निकल गए। ऐसा ही लाक्षागृह अलीगंज के इस कोचिंग को भी बताया जा रहा है क्योंकि इनमें आने जाने के लिए सिर्फ एक रास्ता था। वो ही १५ मौतों का कारण बना। हर जगह ऐसी घटनाओं के बाद लोग पीड़ितों की मदद करने के लिए आगे आते हैं लेकिन अगर वह ऐसी घटनाओं को अंजाम देने वाली इमारतों के बनने की सूचना पीएम सीएम व अफसरों को देने लगे तो नागरिकों की यह जागरुकता इनमें कमी जरुर ला सकती है। जब भी ऐसी घटनाएं होती है तो मीडिया खूब शोर मचाकर दोषियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग करता है लेकिन जिन्हें करनी है वह आश्वासन देकर टाल जाते हैं। खुली जगहों में बड़ी कोठियों में रहते हैं लेकिन सरकार व नेताओं को सोचना होगा कि लोगों के वोट से सरकार बनती है इसलिए इनके जीवन की सुरक्षा जरुरी है।
मेरा मानना है कि कितनी ही खबरें मीडिया में दिखाई जाए लेकिन कच्ची कॉलोनियों के विस्तार अवैध निर्माणों में बिजली पानी और गलत एनओसी विभागों द्वारा दी जाती रहेगी तब तक इन घटनाओं में कमी आने वाली नहीं है। सरकार देश में मकानों की गिनती जनगणना करा रही है अगर फार्म में निर्माण नियम अनुकूल है या नहीं अवैध कॉलोनी है या नहीं इसका विवरण भी प्राप्त कर ले तो ऐसी घटनाओं का कारण बन रही इमारतों का पता चल सकता है। फिर हर जिले में टीम भेजकर जांच कराई जाए कि इसके लिए कौन दोषी है तो इन घटनाओं में कमी आएगी क्योंकि जिम्मेदारों को सजा मिलने से लालची लोग पीछे हट सकते हैं। ऐसी घटनाएं कहीं भी हो सकती है और बच्चे के जाने का दुख बहुत गहरा होता है। इसलिए मृतकों के परिवार के सदस्यों को सरकारी नौकरी, इस हादसे के दोषियों की निजी संपत्ति से दस करोड़ का मुआवजा दिलाया जाए क्योंकि पांच लाख में अब जीवन नहीं चलता है।
(प्रस्तुतिः- रवि कुमार बिश्नोई संपादक दैनिक केसर खुशबू टाइम्स मेरठ)
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