प्रयागराज 25 फरवरी। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश क्रिकेट एसोसिएशन (यूपीसीए) को अपनी अचल संपत्ति को बेचने या हस्तांतरण नहीं करने का निर्देश दिया है. साथ ही अपनी चल संपत्तियों और बैंक खातों का लेखा जोख रखने का निर्देश दिया है. कोर्ट ने यूपीसीए को बीसीसीआई के साथ अपनी संबद्धता के दस्तावेज और टैक्स देनदारियों का विवरण भी पेश करने को कहा है. मामले पर अगली सुनवाई के लिए 13 अप्रैल की तारीख लगाई है.
यह आदेश न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन एवं न्यायमूर्ति सिद्धार्थ नंदन की खंडपीठ ने क्रिकेट एसोसिएशन ऑफ उत्तर प्रदेश की याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया है. याची का तर्क है कि मूल संस्था द उत्तर प्रदेश क्रिकेट एसोसिएशन वर्ष 2005 में ही भंग हो चुकी है. भंग हो चुकी पुरानी संस्था की संपत्तियों और बैंक खातों को धोखाधड़ी से नई कंपनी जो कंपनी एक्ट के तहत पंजीकृत है द्वारा इस्तेमाल किया जा रहा है.
यह भी कहा गया है कि संस्था के पदाधिकारी सुप्रीम कोर्ट द्वारा बीसीसीआई बनाम बिहार क्रिकेट मामले में दिए गए दिशा-निर्देशों के विरुद्ध पदों पर बने हुए हैं. याचिका में यूपीसीए पर लगभग 90 करोड़ रुपये से अधिक की टैक्स चोरी का आरोप लगाया गया है. याचिका में भेदभाव का आरोप लगाते हुए कहा गया कि यूपीसीए प्रदेश के 75 में से 39 जिलों के खिलाड़ियों के साथ भेदभाव कर रहा है और चयन प्रक्रिया में पारदर्शिता की कमी है.
कोर्ट ने मामले की गंभीरता को देखते हुए यूपीसीए, बीसीसीआई, केंद्र सरकार, राज्य सरकार और अन्य को चार सप्ताह के भीतर जवाबी हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया है. कोर्ट ने मुख्य रूप से दो कानूनी बिंदुओं पर जवाब मांगा है, पहला यह कि क्या एक्ट के तहत भंग हुई संस्था की संपत्ति सीधे किसी नई कंपनी को ट्रांसफर की जा सकती है या वह सरकार के पास निहित होनी चाहिए? दूसरा यह कि क्या याची संस्था सोसाइटी एक्ट की धारा 20 के तहत उन संपत्तियों की हकदार हो सकती है?

