प्रयागराज 23 जुलाई। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने मारपीट के 42 वर्ष पुराने मामले में चार महिला अपीलार्थियों को संदेह का लाभ देकर बरी कर दिया है, जबकि दो पुरुष अपीलार्थियों की सजा बरकरार रखी है। घटना मे दो लोगों की मौत हो गई थी। न्यायमूर्ति संजीव कुमार की एकलपीठ ने यह आदेश दिया है।
प्रकरण 20 सितंबर 1984 का है। अभियोजन के अनुसार जमीन विवाद को लेकर झगड़ा हुआ था। मन्नू लाल और उसके परिवारजन ने आरोप लगाया कि बाबू, पुत्तू, हलकी, भजन लाल, बैजनाथ, रामानंद और कुछ महिलाओं सहित कुल 12 लोगों ने उनकी मक्का की फसल जबरन काटनी शुरू की और विरोध करने पर लाठी-दराती से हमला कर मारपीट की।
अपर सत्र न्यायाधीश, ललितपुर ने 14 जून 1988 को सभी 12 आरोपितों को दोषी करार देते हुए सजा सुनाई थी। हालांकि प्रोबेशन आफ आफेंडर्स एक्ट के तहत उन्हें तुरंत जेल नहीं भेजा गया था। इस फैसले के खिलाफ अपील दायर की गई थी, जो लगभग 38 साल तक हाई कोर्ट में लंबित रही।
इस दौरान छह अपीलार्थियों बाबू, पुत्तू, हलकी, बैजनाथ, रामदुलारी और संझली बहू (पुत्तू की पत्नी) का निधन हो गया, जिसके चलते उनके विरुद्ध अपील समाप्त कर दी गई। कोर्ट ने पाया कि मामला वास्तव में ‘क्रास-केस’ था, यानी दोनों पक्षों की ओर से एक-दूसरे के खिलाफ मामले दर्ज थे।
इसी घटना में विरोधी पक्ष के दो लोगों (जालिम और भागीरथ) की हत्या भी हुई थी। कोर्ट ने माना कि यह स्पष्ट नहीं हो पाया कि विवादित जमीन व फसल किसकी थी और न ही यह तय हो सका कि हमला किस पक्ष ने पहले शुरू किया। इसलिए इसे आपसी लड़ाई माना गया।
गवाहों के बयानों में विसंगतियों के आधार पर अदालत ने पाया कि चार महिला अपीलार्थियों बड़ी बहू उर्फ कंचन देवी, संझली बहू (भजनलाल की पत्नी), मंझली बहू (बैजनाथ की पत्नी) और मंझली बहू (जालिम की पत्नी) के विरुद्ध सीधे तौर पर मारपीट में शामिल होने का पुख्ता साक्ष्य नहीं हैं, इसलिए इन्हें बरी कर दिया गया।
भजनलाल और रामानंद के विरुद्ध ठोस साक्ष्य पाए जाने पर उनकी सजा बरकरार रखी गई। दोनों को एक माह के भीतर अदालत में पेश होकर अच्छे आचरण के लिए बांड भरने और प्रोबेशन का लाभ लेने का निर्देश दिया गया है।

