मेरठ 06 जून (प्र)। फैंसी नंबर सीरीज का संचालन भले ही लखनऊ मुख्यालय स्तर से होता हो, लेकिन स्थानीय संभागीय परिवहन विभाग भी पूरी प्रक्रिया से अनभिज्ञ नहीं रहता। विभागीय स्तर पर यह जानकारी रहती है कि किस नंबर पर कितनी बोली लगी, किसने आवेदन किया और अंतिम आवंटन किसे हुआ। इसके बावजूद एफएफ 0001 नंबर की नीलामी को लेकर उठे सवालों पर स्पष्ट जानकारी सामने नहीं आ रही है। यही वजह है कि पूरे मामले को लेकर चर्चाओं का बाजार गर्म है। मेरठ में वीआईपी नंबर एफएफ – 0001 इन दिनों चर्चा का केंद्र बना हुआ है। सूत्रों के अनुसार, इस नंबर पर 16 लाख रुपये तक की सबसे ऊंची बोली लगी थी। लेकिन चर्चा यह है कि सबसे बड़ी बोली लगाने वाले व्यक्ति ने निर्धारित अवधि में भुगतान और आवंटन की प्रक्रिया पूरी नहीं की। इसके बाद करीब 14 लाख रुपये की दूसरी सबसे बड़ी बोली सामने आई। अब सवाल यह है कि यदि 16 लाख रुपये की बोली वास्तविक थी तो भुगतान क्यों नहीं हुआ और यदि भुगतान नहीं हुआ तो अंतिम रूप से नंबर किसे मिला? पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल पारदर्शिता को लेकर उठ रहा है।
विभाग का कहना है कि फैंसी नंबरों से जुड़ी विस्तृत जानकारी मुख्यालय स्तर पर उपलब्ध होती है, लेकिन स्थानीय स्तर पर भी प्रक्रिया से संबंधित महत्वपूर्ण जानकारियां रहती हैं। इसके बावजूद एफएफ- 0001 मामले में स्पष्ट स्थिति सामने नहीं आने से कई तरह की चर्चाएं जन्म ले रही हैं। जानकारों के अनुसार, फैंसी नंबर की नीलामी जीतने वाले व्यक्ति को निर्धारित समय सीमा के भीतर भुगतान करना होता है। यदि भुगतान नहीं किया जाता तो नियमानुसार अगली पात्र बोली पर विचार किया जा सकता है। ऐसे में यह जानना जरूरी है कि क्या 14 लाख रुपये की दूसरी बोली लगाने वाले को मौका दिया गया या नहीं यदि दिया गया तो नंबर का अंतिम आवंटन किसे हुआ और सरकार को कितना राजस्व प्राप्त हुआ? विशेषज्ञों का मानना है कि यदि कोई व्यक्ति ऊंची बोली लगाकर बाद में पीछे हट जाता है तो इससे न केवल नीलामी प्रक्रिया प्रभावित होती है, बल्कि सरकार को मिलने वाले संभावित राजस्व पर भी असर पड़ सकता है।
फैंसी नंबर की जानकारी मुख्यालय के पास : आरटीओ
आरटीओ अनीता सिंह का कहना है कि फैंसी नंबर सीरीज की पूरी व्यवस्था और नियंत्रण लखनऊ स्थित परिवहन मुख्यालय के स्तर से संचालित होता है। उनके अनुसार एफएफ – 0001 नंबर किस व्यक्ति ने लिया, कितनी बोली लगी और अंतिम खरीद कितनी राशि में हुई, इसकी सटीक जानकारी मुख्यालय के रिकॉर्ड में उपलब्ध रहती है। उन्होंने बताया कि सामान्य पोर्टल पर भी जानकारी तभी दिखाई देती है, जब संबंधित वाहन का रजिस्ट्रेशन पूरा हो जाता है। उससे पहले बोली प्रक्रिया से जुड़ी विस्तृत जानकारी। सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं होती। ऐसे में किसी भी फैंसी नंबर के अंतिम आवंटन और भुगतान संबंधी प्रमाणिक जानकारी के लिए मुख्यालय स्तर का रिकॉर्ड ही अधिकृत आधार माना जाता है।
हरियाणा में जब्त हुई थी जमानत राशि
हरियाणा में वीआईपी वाहन नंबर एचआर-88बी-8888 की नीलामी पूरे देश में चर्चा का • विषय बनी थी। इस नंबर के लिए एक बोलीदाता ने 1.17 करोड़ रुपये की रिकॉर्ड बोली लगाई थी, लेकिन निर्धारित समय के भीतर पूरी राशि जमा नहीं की। इसके बाद परिवहन विभाग ने बोलीदाता की 10 हजार रुपये की जमानत राशि जब्त कर ली और नंबर को दोबारा नीलामी के लिए डाल दिया। मामला यहीं नहीं रुका। हरियाणा के परिवहन मंत्री ने अधिकारियों को बोली लगाने वाले व्यक्ति की आय, संपत्ति और आर्थिक क्षमता की जांच के निर्देश दिए। साथ ही आयकर विभाग से भी तथ्य जुटाने की बात कही गई, ताकि यह पता लगाया जा सके कि इतनी बड़ी बोली लगाने वाला व्यक्ति वास्तव में भुगतान करने की क्षमता रखता था या नहीं। इस मामले में जमानत राशि जब्त करने, नंबर की पुनः नीलामी कराने और आर्थिक जांच के आदेश दिए गए थे। यह मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण माना गया क्योकि विशेषज्ञों ने इसे फैंसी नंबर नीलामी प्रणाली की गंभीरता और पारदर्शिता से जोड़कर देखा। बाद में यही नंबर दोबारा नीलामी में लगभग 26.7 लाख रुपये में आवंटित किया गया।
रिकॉर्ड से ही सामने आएगी सच्चाई
फिलहाल पूरे मामले में चर्चा ज्यादा और आधिकारिक जानकारी कम है। परिवहन विभाग के रिकॉर्ड, भुगतान की स्थिति, अंतिम आवंटन और संबंधित कार्रवाई की जानकारी सामने आने के बाद ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि 16 लाख रुपये की बोली का आखिर क्या हुआ जब तक इन सवालों के जवाब सार्वजनिक नहीं होते, तब तक एफएफ-0001 की नीलामी मेरठ में चर्चा और जिज्ञासा का विषय बनी रहेगी।

