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    Home»देश»घटनाओं के बाद प्रतिनिधिमंडलों के मौके पर जाने से रोका जाना बंद हो, सदस्यों की संख्या तय कर कोई बवाल नहीं होगा लिखकर लिया जाए
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    घटनाओं के बाद प्रतिनिधिमंडलों के मौके पर जाने से रोका जाना बंद हो, सदस्यों की संख्या तय कर कोई बवाल नहीं होगा लिखकर लिया जाए

    adminBy adminJanuary 13, 2026No Comments10 Views
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    देश में रोज ही कहीं ना कहीं पुलिस और किसी प्रतिनिधिमंडल के बीच किसी क्षेत्र में जाने और रोकने को लेकर विवाद ना होता हो ऐसा लगता नहीं है। वो बात और है कि घटना के हिसाब और उसकी गंभीरता को लेकर प्रतिनिधिमंडल राष्ट्रीय प्रदेश या जिले स्तर का हो सकता है। इनमें सांसद और विधायकों के साथ साथ राजनीतिक और सामाजिक दलों के पदाधिकारी या नेता के भी हो सकते हैं। जो भी हो मीडिया की सुर्खियों में इसे लेकर विवाद की खबरें आना कोई बड़ी बात नहीं लगती।
    सभी जानते हैं कि जिस स्तर की घटना होती है उसी स्तर के नेता मौके पर पहुंचने के लिए कोशिश करते हैं। कई मौकों पर पुलिस प्रशासन नेताओं को रोकने में सफल होता है तो जिले के नेता घटनास्थल पर पहुंच जाते हैं। मगर इस पूरे पं्रकरण में कानून व्यवस्था का काम करने वाली पुलिस के अधिकारी उलझकर रह जाते हैं और कभी तो गंभीर घटना में पीएसी और सुरक्षा बल के साथ बड़े अधिकारी भी इस मामले में उलझ जाते हैं जिससे आम आदमी का रोजमर्रा का कार्य प्रभावित तो होता है इनके कार्य क्षेत्र में आने वाले काम भी रूक जाते हैं। विवाद होता है वो अलग। कहीं तो रोकने व जाने की जिद पर इतने कर्मचारी और अधिकारी लग जाते हैं जिनकी तनख्वाह पर कई लाख रूपये खर्च होते हैं।
    भयमुक्त वातावरण और पारदर्शी कानून व्यवस्था बनाना शासन प्रशासन की जिम्मेदारी है तो घटनास्थल पर जाकर अपनी संवदेनाएं जताना जनप्रतिनिधियों के लिए भी जरूरी है। इसलिए मेरा मानना है कि प्रतिनिधिमंडलों को रोकने और ऐसे मामलों को लेकर होने वाले विवाद हठधर्मी व प्रभावित होने वाले काम को ध्यान में रखते हुए सरकार शासन सांसदों विधायकों को इस बारे में कुछ ऐसी नीति अपनानी चाहिए जो जाने और रोकने के नाम पर समय और पैसे की बर्बादी को रोका जा सके।
    सभी जानते हैं कि ना तो कोई प्रतिनिधिमंडल मौके पर किसी को न्याय दिला सकता है सब काम नियमानुसार होना है। ऐसे में अगर राजनीतिक दलों के प्रतिनिधिमंडल पीड़ितों से मिलकर अपना समर्थन देने का आश्वासन देते हैं तो इसमें कोई बुराई भी नहीं है। पुलिस प्रशासन अफसरों को तैनात करें लेकिन प्रतिनिधिमंडलों को जाने से ना रोका जाए। जहां इन्हें जाना है उसकी सीमा पर इतनी घेराबंदी की जाए कि उन्हें कुछ समय के लिए रोककर उनसे लिखित में कोई गड़बड़ी ना होने की तय कर ली जाए। हो सकता है मेरा अनुमान गलत हो लेकिन जहां तक देखा उससे यही कह सकते हैं कि रोकने और जाने की लड़ाई शुरू होती है उस पर विराम लग सकता है। कई लोगों के पास तो लोग ही नहीं जुट पाते लेकिन धींगामुश्ती कर वह अपनी मंशा में सफल हो जाते हैं।
    मेरा मानना है कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया का उल्लंघन ना हो। नेता पीड़ितों से मिल ले और कोई बवाल ना हो इसलिए रोकने और जाने के विवाद पर विराम लगे और नीति के आधार पर पीड़ित तक पहुंचाने की सुविधा खुद प्रशासन उपलब्ध करा दे तो फोर्स और अधिकारियों का समय बचेगा। आम आदमी के काम समय से हो पाएंगे। दोनों एक दूसरे का सुख दुख बांटने का काम भी पूरा कर लेंगे। अब वो समय नहीं रहा कि पुरानी लकीर पर चलते हुए सारी ताकत ऐसे कार्यो में लगा दी जाए और खाली दफ्तरों को देखकर लोग अपने काम कराए बिना वापस लौटे।
    (प्रस्तुतिः- रवि कुमार बिश्नोई संपादक दैनिक केसर खुशबू टाइम्स मेरठ)

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