भगवान तो भगवान ही है उसकी बराबरी कोई नहीं कर सकता लेकिन जैसा कहा जाता है कि बीमारियों से छ़ुटकारा दिलाने वाला डॉक्टर को भी धरती पर इसी का रुप कह सकते हैं। १२ साल पहले मोतियाबिंद का ऑपरेशन कराना था लेकिन कई कारणों से टलता जा रहा था। बीते चार दिन पहले जब आंखों से शब्द पढ़ना भी समाप्त हो गया तो इस बारे में सोचा। फिर सोचा कि किससे कराया जाए जो रोशनी वापस आ जाए। तब अपने परिचित डॉक्टर तनुराज सिरोही आईएमए के पूर्व अध्यक्ष डॉ एमके बंसल डॉ सरोजिनी अग्रवाल व स्वतंत्र पत्रकार सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता डॉ संजय गुप्ता अन्नपूर्णा हॉस्पिटल ट्रस्ट के ब्रजभूषण गुप्ता से चर्चा हुई। सबने कहा कि बच्चा पार्क स्थित दृष्टि आई क्लीनिक में गौरव मिश्रा या सिद्धार्थ शर्मा से कराना उचित रहेगा। अपने पुत्र अंकित बिश्नोई के साथ वहां पहुंचा तो यह देखकर अच्छा लगा कि वहां जूनियर डॉक्टर नर्सो का व्यवहार बहुत अ च्छा था और डॉ गौरव मिश्रा के व्यवहार ने आधा डर समाप्त कर दिया। पांच घंटे चले टेस्ट और विचार के बाद बीती ५ तारीख को आधुनिक मशीनों से डॉ गौरव मिश्रा ने लगभग छह सात मिनट में लेजर सर्जरी की और इस दौरान भी उनका बर्ताव बहुत अच्छा था। पूरे ऑपरेशन के दौरान यही लगता रहा कि आंखों को पानी से धोया जा रहा है लेकिन ऐसा नहीं लगा कि आंखों पर कुछ हो रहा है। ऑपरेशन इतनी जल्दी और बिना किसी परेशानी के होने पर बड़ा ताज्जुब हुआ और एक सफेद चश्मा पहनाकर कुछ देर आंखें बंद रखने को कहा गया। उसके बाद सब रुटीन से करिए तीन चार दिन थोड़ी धुंधलाहट रहेगी। नर्सों का कहना था कि अब आप टीवी देख सकते है यहां उपासना की मदद और सलाह से सारा काम सुविधा से होता गया और यह महसूस नहीं हुआ कि इतने बड़े अस्पताल में ऑपरेशन कराया है। इससे बड़ी बात कि इस ऑपरेशन में काफी पैसा लगना था अस्पताल की ईमानदार प्रतिष्ठा के चलते जो बीमा कराया था उन्होंने पूरा विवरण कंपनी को भेजा और एक घंटे में वो स्वीकृत होकर आ गया। कहने का आश्य है कि अस्पताल और डॉक्टर की सांख व ईमानदारी से बिना कोई पैसा खर्च किए आधुनिक मशीनों से ऑपरेशन संपन्न हो गया और भले ही डॉक्टर ने कहा हो कि तीन चार दिन बाद धुंधलापन खत्म हो जाए लेकिन ना कोई दर्द था ना परेशानी। उनके अनुसार दवाई डालते रहो। यह सब बाते लिखने का आश्य है कि मुझे डॉक्टरो के यहां जाने से काफी भय लगता था कि पता नहीं क्या और कैसे होगा और कैसा व्यवहार करें लेकिन डॉ गौरव मिश्रा और उनके स्टाफ की कार्यप्रणाली से मेरी सोच बदल गई। ऑपरेशन के बाद किसी ने भी ईनाम की इच्छा व्यक्त नहीं की जबकि पहले देखा कि नर्सिंग होम में छ़टटी के समय ईनाम मांगा जाता है। डॉ सिद्धार्थ शर्मा के बारे में भी सबकी अच्छी राय थी और कहना था कि वो भी प्यार से ऑपरेशन करते हैं और मरीजों से व्यवहार अच्छा होता है।
(प्रस्तुतिः- रवि कुमार बिश्नोई संपादक दैनिक केसर खुशबू टाइम्स मेरठ)
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