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    Home»देश»लंबे समय तक जमानत न देना सजा के समान : कोर्ट
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    लंबे समय तक जमानत न देना सजा के समान : कोर्ट

    websitemarketing2019@gmail.comBy websitemarketing2019@gmail.comJanuary 7, 2026No Comments8 Views
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    नई दिल्ली 07 जनवरी। सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को कहा कि मुकदमे का ट्रायल शुरू हुए बिना या उसमें उचित प्रगति के बगैर विचाराधीन कैदी को लंबे समय तक जेल में रखना, सजा के बराबर है। शीर्ष अदालत ने यह भी कहा कि संविधान के अनुच्छेद-21 के तहत गारंटीकृत ‘जल्द सुनवाई का अधिकार’ अपराध की गंभीर प्रकृति होने भर से खत्म नहीं होता है।

    जस्टिस संजय कुमार और आलोक अराधे की पीठ ने धनशोधन मामले में एमटेक समूह के प्रवर्तक अरविंद धाम को जमानत पर रिहा करने का आदेश देते हुए यह टिप्पणी की। पीठ ने कहा कि यदि राज्य, अभियोजन एजेंसी या संबंधित अदालत के पास अनुच्छेद-21 के तहत आरोपी के जल्द सुनवाई के मौलिक अधिकार को सुरक्षित रखने का कोई साधन नहीं है, तो राज्य या एजेंसी सिर्फ इस आधार पर जमानत याचिका का विरोध नहीं कर सकती कि कथित अपराध गंभीर है।

    पीठ ने अपने फैसले में कहा कि आर्थिक अपराध एक सजातीय वर्ग नहीं हैं। पीठ ने ईडी के इस तर्क को खारिज कर दिया कि अकेले आर्थिक अपराधों की गंभीरता लंबे समय तक कारावास को सही ठहराती है। धनशोधन निवारण कानून के तहत, जहां अधिकतम सजा सात साल है। शीर्ष अदालत ने एमटेक समूह के प्रवर्तन अरविंद धाम को जमानत पर रिहा करने का आदेश दिया।

    अरविंद धाम 9 जुलाई 2024 से न्यायिक हिरासत में हैं. अदालत ने कहा कि अभियोजन शिकायतें दाखिल हो चुकी हैं लेकिन अभी तक संज्ञान नहीं लिया गया है. मामला केवल दस्तावेजों की जांच के स्तर पर ही लंबित है. साथ ही 210 गवाहों की सूची को देखते हुए निकट भविष्य में मुकदमे के शुरू होने की कोई वास्तविक संभावना नहीं दिखाई दी.

    यदि राज्य या जांच एजेंसियां किसी आरोपी के त्वरित सुनवाई के अधिकार की रक्षा करने में असमर्थ हैं तो केवल अपराध की गंभीरता का आधार लेकर जमानत का विरोध नहीं किया जा सकता. अदालत ने कई मामलों का हवाला देते हुए कहा कि लंबी विचाराधीन कैद जमानत के पक्ष में निर्णायक कारक है.

    विशेषकर तब जब साक्ष्य मुख्य रूप से दस्तावेजी हों और पहले से अभियोजन के कब्जे में हों. सुप्रीम कोर्ट ने यह भी पाया कि मामले में देरी का बड़ा कारण प्रवर्तन निदेशालय द्वारा की गई कार्यवाही रही, जिसके चलते सुनवाई लंबे समय तक स्थगित रही.

    अदालत ने धाम के खिलाफ गवाहों को प्रभावित करने या संपत्तियों के निस्तारण के आरोपों को भी खारिज किया. अदालत ने कहा कि आर्थिक अपराध समान प्रकृति के नहीं होते और केवल गंभीरता के आधार पर जमानत से इनकार उचित नहीं है. अदालत ने धाम को पासपोर्ट जमा करने और बिना ट्रायल कोर्ट की अनुमति से विदेश जाने पर रोक लगाई है.

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