बिजली की हालत कई दशक से हर साल काफी खर्च होने के बावजूद बद से बदतर होती जा रही है। स्थिति यह है कि हर शहर में ही अघोषित बिजली कटौती होना या खराबी के नाम पर लोगों को गर्मी में परेशान होने के लिए छोड़ना इस विभाग की अब आदत सी बन गई लगती है। हमेशा कहा जाता है कि अब सुधार होगा इस नाम पर दरों में बढ़ोत्तरी होती है और रखरखाव का बजट भी बढ़ा दिया जाता है लेकिन ना विभाग के अधिकारी कर्मचारी सुधरने को तैयार है ना व्यवस्था। आए दिन पढ़ने को मिलता है कि किसी गरीब को भेज दिया लाखों का बिल। काफी भागदौड़ के बाद उसका बिल ठीक होता है। पूरे वर्ष बिजली के जर्जर तार, टेढ़े खंभो की शिकायत लोग खूब करते हैं लेकिन सुधार के नाम पर हर साल की भांति इस बार भी परेशानियों का सामना करना पड़ा रहा है। दावों घोषणाओं के बाद बारिश आ गई और सर्दी आ जाएगी और लोगों को गर्मी से राहत मिलेगी और विभाग अपने पुराने ढर्रे पर चल पड़ेगा। बीते दिवस कैंट विधायक अमित अग्रवाल पॉवर कारपोरेशन के मुख्य ऑफिस पहुंचे और अफसरों से पूछा कि क्यों गुम हो रही है बिजली। कटौती कम करने की बात हुई लेकिन सवाल उठता है कि कटौती कम करेंगे तो बिजली कहां से आएगी। क्या अफसर अभी तक शिकायत आने का इंतजार कर रहे थे। अब विभाग के लोगों की बातों पर आम आदमी विश्वास करने को तैयार नहीं है।
पीवीवीएनएल के प्रबंध निदेशक रवीश गुप्ता द्वारा डिस्कॉम के १४ जिलों में बिजली व्यवस्था को सुदृढ करने के लिए कार्य किया जा रहा है। उनका कहना है कि मौजूदा गर्मी के सीजन में बिजली की मांग बेतहाशा बढ़ने से ओवरलोड चल रहे है। जो भी हो यह सही है कि प्रबंध निदेशक रवीश गुप्ता आम आदमी की समस्याओं को समझते हैं और सुधार करना चाहते हैँ लेकिन जब मांग के मुकाबले उत्पादन में बढ़ोत्तरी नहीं हो रही तो आखिर बिजली आपूर्ति व्यवस्था में सुधार कैसे हो पाएगा। बताते चलेें कि जब देश में अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री थे तो दिल्ली के एक वीआईपी क्षेत्र में बिजली गुल हुई तो कहा गया कि जल्दी ही सुधार होगा । इसके उत्पादन बढ़ाने के जो प्रयास चल रहे हैँ। इन बातों को काफी साल हो गए हैं लेकिन सुधार के नाम पर वही ढाक के तीन पात। अब अफसरो का कहना है कि बिजली व्यवस्था सुधारने के लिए १०० करोड़ के कार्य के प्रस्ताव भेजे गए थे जिस पर ४५ करोड़ के कार्य की स्वीकृति मिल गई है। जिससे जर्जर तारों को बदलना, ट्रांसफार्मरों की क्षमता बढ़ाने के काम किया जाएगा।
सवाल उठता है कि यह कोई एक दिन में खराब नहीं हो गए हैं। यह सालों से खराब चल रहे हैं। लोगों का कहना है कि ठेकेदारों से मिलीभगत कर कुछ अफसर काम होते समय क्वालिटी पर ध्यान नहीं देते जिससे परेशानी ज्यादा होती है। अब १०० में से ४५ करोउ़ मंजूर किए गए। अब अगले साल कह दिया जाएगा कि मंाग के अनुसार बजट नहीं मिला। अब आगे सुधार कर लिया जाएगा। एमडी के आदेश पर सुधार की योजना बन रही है लेकिन इस पद पर हमेशा वरिष्ठ आईएएस रहे हैं और सबने सुधार के प्रयास किए मगर सारे दावे और योजनाएं ढोल की पोल साबित होकर रह गई। लोग कहने लगे हैं कि मुंगेरी लाल के सपने मत दिखाईये कुछ करके दिखाईये क्योंकि सपने टूटने पर काफी दुखदायी कष्ट होता है। नागरिकों का कहना है कि बिजली विभाग के अफसरों के यहां लाइट नहीं जाती और जाती है तो कुछ समय में ही आ जाती है। जिस तरह सीएम के आदेश के अनुसार अफसर गांवों में रात्रि विश्राम कर समस्याएं सुनते हैँ उसी तरह बिजली विभाग के अफसर मलिन व घनी बस्तियों में समय गुजारे तो पता चलेगा कि आम आदमी को कितने कष्ट झेलने पड़ते हैं। विभाग के मंत्री ने कहा कि कटौती कम होगी और सुधार हो रहा है लेकिन कहां हो रहा है। यह जरुर है कि मंत्री और अफसरों में खींचतान इस व्यवस्था को खराब करने में भूमिका निभा रही है। बिजली आपूर्ति में सुधार होना चाहिए केवल हसीन सपनें दिखाने से कुछ होने वाला नहीं है। यह तभी हो सकता है जब उत्पादन बढ़ाया जाए और जिस अफसर के क्षेत्र में जर्जर तार खंभे और घर के ऊपर से बिजली के तार जाते मिले उसे निलंबित किया जाए और एसडीओ की कार्यप्रणाली में सुधार होना चाहिए क्योंकि इस विभाग के अफसरों कर्मचारियों की वजह से पुलिस प्रशासन के लिए बनी चुनौतियां कम हो सकती है। मुझे लगता है कि इस मामले में निजीकरण का विरोध करने वाले अफसरों व कर्मचारियेां को व्यवस्था सुधारनी चाहिए जिससे निजीकरण की जरुरत ना पडुे। मुख्यमंत्री जी अगर इस विभाग के अफसरों को टाइट करे और सुविधाओ में कटौती करे तो बिजली की किल्लत कम और व्यवस्था में सुधार हो सकता है।
(प्रस्तुतिः- रवि कुमार बिश्नोई संपादक दैनिक केसर खुशबू टाइम्स मेरठ)
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