हॉकी टीम के नीले रंग को बदलकर नारंगी किए जाने पर पूर्व भारतीय कप्तान वीरेन रासक्विन्हा द्वारा नाराजगी जताते हुए सवाल उठाया कि आखिर भारतीय हॉकी टीम की पहचान रहे नीले रंग को बदलने की जरुरत क्यों पड़ी। प्रगट सिंह पूर्व डिफेंडर का कहना है कि देश में हर चीज का भगवाकरण हो रहा है शिक्षा इतिहास और अब खेल, यह चिंताजनक है। खेल लोगों में एकता लाता है यह धर्म राजनीति से ऊपर उठाताहै। इसमें ऐसी चीज आती है तो यह दुर्भाग्यपूर्ण है। पूर्व कप्तान धनराज पिल्लई का कहना है कि नीले जर्सी भारतीय हॉकी की पहचान रही है। हमारे राष्ट्रीय ध्वज का हिस्सा होने के नाते केसरिया शुभ है लेकिन यह भारतीय हॉकी का परंपरागत रंग कभी नहीं रहा। इतने सालों बाद हो रहा यह परिवर्तन मेरी समझ से परे हैं। देश में सबको अपनी बात कहने का अधिकार है। इसलिए ओढिसा के पूर्व सीएम नवीन पटनायक द्वारा भी इस प्रयास को सही नहीं बताया गया। जो भी हो खिलाड़ी हर काम खेल भावना से करता है। राजनीति से उसका सरोकार नहीं होता है। सबकी अपनी विचारधारा होती है इसलिए अपना मत प्रकट करने पर कोई बुराई नहीं है लेकिन हमें यह भी देखना चाहिए कि रंग क्यों बदला गया और बदलाव वक्त की सबसे बड़ी मंाग है। नागरिक बदलाव की मांग हमेशा करते हैं। ऐसे में जब हर मामले में बदलाव हो सकता है नीति बदली जा सकती है तो फिर हॉकी टीम की जर्सी केसरिया रंग में क्यों तैयार नहीं हो सकती। हम बदलकर कपड़े पहनते हैं। घरों के रंग भी बदलते हैं। जहां तक पहचान की बात है तो जैसे नीले रंग की पहचान बनी थी अब केसरिया रंग की पहचान बन जाएगी। मुझे लगता है कि हर बात को राजनीतिक दृष्टिकोण से नहीं देखा जाना चाहिए। लेकिनहमारे यहां तो राय देने की छृट है। अच्छाहै कि हमारे यहां विरोध की छूट है वरना इसे लेकर भी सड़क पर भी आंदोलन शुरू नहीं हुए वरना हर बात पर धरना प्रदर्शन और आंदोलन का हिस्सा बना ही दिया जाता है। अब कुछ लोग इसे भगवाकरण कह रहे हैं तो कुछ यह भी कह सकते हैंं कि यह बसपा के झंडे का रंग था लेकिन इन दोनों ही बातों का इससे क्या मतलब है। राष्ट्रीय ध्वज में केसरिया और नीला रंग दोनों है तो इस पर विवाद क्यों। मैं किसी राजनीतिक दल का हिस्सा नहीं हू लेकिन राष्ट्रीय ध्वज में तो यह कलर है ही। इसे हम अपनी श्रद्धा से भी जोड़ सकते हैं। क्योंकि हर भारतवासी इसे लेकर कोई विवाद खड़ा नहीं करेगा। अगर हर बात नजरअंदाज कर दें तो यह भी है कि आखिर केसरिया रंग को हम बढ़ावा नहीं देंगे तो क्या पाकिस्तान में इसका सम्मान होगा। साधु संत और आम आदमी भी इसका उपयोग करते हैं तो इसका विरोध क्यों। मेरा मानना है कि भारतवासी की भावनाओं में केसरिया रंग समाया है तो हॉकी टीम की जर्सी पर विवाद क्यों। यह तो मन की बात है स्मरण रहे कि साढ़े चार दशक पूर्व एक बार मैं ऋषिकेश गया तो केसरिया रंग इतना भाया कि उसके कपड़े पहने। कहने का मतलब है कि इस मुददे पर मतभेद नहीं होना चाहिए और इस रंग पर कोई विवाद ठीक नहीं है। अगर हो भी तो जो रंग पसंद आ गया उसे खत्म नहीं करना चाहिए। चाहे इसमें एक रंग और जोड़ दिया जाए क्योंकि तेरी मां ने खसम किया बुरा किया करके छोड़ दिया और बुरा किया इसलिए विरोध की चिंता किए बिना समाधान का रास्ता निकाला जाए तो अच्छा है।
(प्रस्तुतिः- रवि कुमार बिश्नोई संपादक दैनिक केसर खुशबू टाइम्स मेरठ)
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