गोंडा 13 जुलाई। गोंडा पुलिस और साइबर सेल ने रविवार को 5 अंतरराज्यीय साइबर ठगों को गिरफ्तार किया है। इसमें एक आरोपी भाजपा का पूर्व ओबीसी मोर्चा नगर मंत्री है। जांच में अब तक 20 से अधिक खातों से 21 करोड़ रुपए से ज्यादा का लेनदेन हुआ है।
पुलिस के मुताबिक, आरोपी पहले बेरोजगार युवकों को सोलर कंपनी में नौकरी का झांसा देते। इसके बाद उनका सैलरी अकाउंट खुलवाते। इन अकाउंट्स को ‘म्यूल अकाउंट’ बनाकर देशभर में निवेश ठगी, डिजिटल अरेस्ट और सेक्सटॉर्शन जैसे साइबर अपराधों से हासिल करोड़ों रुपए ट्रांसफर करते थे।
आरोपियों के पास से 6 मोबाइल फोन, 15 आधार कार्ड, 10 सिम कार्ड, 8 मोहरें, दो बाइक और कई फर्मों के फर्जी दस्तावेज बरामद किए हैं। मामला देहात कोतवाली क्षेत्र का है।
मामले की शुरुआत सिसई टिकरिया निवासी वीरेंद्र प्रताप और सत्यम तिवारी की शिकायत से हुई। दोनों ने 11 जुलाई को देहात कोतवाली में तहरीर दी। आरोप लगाया कि सोलर कंपनी में 15 हजार रुपए महीने की नौकरी का लालच दिया गया।
वीरेंद्र प्रताप ने सुबह करीब 11 बजे शिकायत दर्ज कराई। उनकी तहरीर पर दोपहर 1:57 बजे मुकदमा दर्ज हुआ। इसमें विजय सोनी, कृष्ण प्रताप सिंह, दीपक गोयल, साहबान उर्फ सोनू और दो अज्ञात लोगों को आरोपी बनाया गया।
इसके बाद सत्यम तिवारी ने दोपहर करीब 2 बजे दूसरी तहरीर दी। इस शिकायत पर शाम 4:47 बजे मुकदमा दर्ज किया गया। इसमें देवनारायण मिश्रा उर्फ अंशु मिश्रा, कृष्ण प्रताप सिंह, दीपक गोयल, ओम साइबर कैफे संचालक और गंगोत्री पांडेय को आरोपी बनाया गया।
वीरेंद्र प्रताप ने बताया कि 21 फरवरी 2026 को विजय सोनी और दीपक गोयल उन्हें प्रथमा यूपी ग्रामीण बैंक की बड़गांव शाखा ले गए। वहां सैलरी अकाउंट खुलवाया। उन्होंने 21 फरवरी से अप्रैल 2026 तक सोलर कंपनी के कार्यालय में काम किया। मई में उन्होंने वेतन मांगा। आरोपियों ने कहा कि सैलरी खाते में भेज दी गई है।
इसके बाद वह बैंक पहुंचे और खाते का स्टेटमेंट निकलवाया। स्टेटमेंट देखकर उनके होश उड़ गए। खाते में वेतन नहीं आया था। इसके बजाय करीब ढाई करोड़ रुपए का लेनदेन दर्ज था। तभी उन्हें पूरे फर्जीवाड़े का पता चला। साथ ही पता चला कि अकाउंट उनके नाम से नहीं श्री श्याम इंटरप्राइजेज के नाम से करंट अकाउंट खोला गया है।
खाते में आरोपियों ने अपना मोबाइल नंबर लिंक कराया। इससे नेट बैंकिंग का पूरा कंट्रोल उनके पास रहा। 21 फरवरी से 6 मार्च के बीच खातों से आरटीजीएस के जरिए करीब ढाई करोड़ रुपए अलग-अलग खातों से भेज दिए गए। बाद में बैंक पहुंचने पर उन्हें पूरे फर्जीवाड़े का पता चला।

