चाय की दुकान और सब्जी का ठेला लगाने व जमीन पर बैठक सामान बेचने से लेकर बड़े उद्योगपतियों को भी उधार लेने से मुक्ति नहीं मिलती। चाहे वह बैंकों से लिया गया हो या फाइनेंस कंपनी से। क्योंकि समाज का ढांचा उधार लेने की व्यवस्था पर ही टिका हुआ है। यह तभी संभव है जब हर व्यक्ति अपनी बात पर खरा उतरते हुए उधार देने और लेने की व्यवस्था में पारदर्शिता बनाए रखे। ९० प्रतिशत से ज्यादा मामलों में ऐसा हो भी रहा है इसलिए व्यापार प्रगति में है और सामाजिक व्यवस्था सुचारू चल रही है।
पिछले कुछ सालों से यह देखने सुनने को मिल रहा है कि बड़े उद्योगपति बैंक कर्मियों की मिलीभगत से फर्जी कागजातों पर लोन ले हैं मगर अदा करने की बजाय विदेश भाग रहे हैं। निचले स्तर पर भी ऐसा दिखाई देने लगा है कि आपस के लोग मदद की मांग करते हैं और मानवीय द्ष्टिकोण से देने वाला पीछे नहीं रहता लेकिन लेते समय जो विनम्र आग्रह करते हैं और अपनी ईमानदारी से लौटाने की बात कहते हैं और बच्चों की कसम खाने में हीं चूकते उनके द्वारा समय से लेनदारी का रिश्ता नहीं निभाया जा रहा। कई लोग कहते सुने जाते हैं कि फलां व्यक्ति से बड़ा अच्छा रिश्ता था। बेटी की शादी या इलाज के लिए पैसा ले गए और अब दे नहीं रहे। कुछ घर बनाने और बच्चों की पढ़ाई के लिए पैसा लेते हैं और वापस नहीं लौटाते। इसे लेकर जो विवाद बढ़ रहे हैं और संबंधों में कटुता हो रही है। उससे यही लगता है कि रूपया उधार ना दिया जाए। मगर ऐसा हो नहीं सकता। तो सवाल उठता है कि व्यवस्था कैसे बने क्योंकि जब लेनदार देने की बजाय पैसा वापस ना करे तो क्या किया जाए। कई बार सुनने को मिलता है कि लेनदार घर का सामान उठा लाया या परिवार की महिलाओं को जबरदस्ती ले जाने की कोशिश हुई। यह बात सही नहीं कही जा सकती।
मेरा मानना है कि जितना पास में है उसी में गुजारा करो मगर प्रगृति और आगे बढ़ने के इस दौर में यह संभव ही नहीं है और यह भी पक्का है कि सबको इस दौर से गुजरना पड़ता है। ऐसे में संबंधों में मधुरता बनी रहे और दोबारा मांग भी ना हो इसके लिए समय पड़ने पर यह सोचकर कि जो ले जा रहा है उसे मांगना नहीं है दे जाए तो ठीक ना दे तो ठीक एक फायदा होगा कि उसे दोबारा मांगने का हौंसला नहीं पड़ेगा। इससे विभिन्न प्रकार की परेशानियों से बचेंगे और हो सकता है वह देर सवेर वापस कर जाए। इसलिए जरूरी है कि संयम बनाकर जिस परिस्थिति है उसमें दिया गया पैसा या सामान वापस आने की कल्पना ना करें तो आप और व्यवस्था सही रहेंगी सामान और पैसा वापस आने की संभावना बनी रहेंगी।
(प्रस्तुतिः- रवि कुमार बिश्नोई संपादक दैनिक केसर खुशबू टाइम्स मेरठ)
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