विवाह समारोह आदि में दहेज या जरूरत से ज्यादा दिखावा करने की आलोचनाओं के बीच उनके आयोजनों में तो कोई विशेष फर्क आया नहीं लेकिन परिवार के किसी सदस्य के बिछुड़ जाने के उपरांत जो तेरहवीं भोज आयोजित होते हैं वह अब चर्चा का विषय बनने लगे हैं पहले पांच या सात अथवा 11 ब्राहम्ण विधि विधान के अनुसार जिमाये जाते थे जिससे जो बिछुड़ गया है धार्मिक दृष्टिकोण से उसकी आत्मा को शांति मिले। धीरे धीरे इस मौके पर आने वालों को गांव देहातों से लेकर शहरों तक में आलू भेलियां और लड्डू कचौड़ी परोसी जाने लगी धीरे धीरे आने वालों पर खाने के लिए प्रभाव डाला जाने लगा जिस कारण से तेरहवीं में आने वाले लगभग ज्यादातर लोग भोजन करके ही जाते हैं अब यह ठीक है या गलत यह तो भगवान ही जानें मगर ऐसे मौकों पर कई जगह हम भी भोजन करके आते हैं इससे इंकार नहीं किया जा सकता।
मगर अब जो आत्मा की शांति और श्रद्धांजलि देने और परिवार के मुखिया को जिम्मेदारी सौंपने के लिए होने वाले आयोजन में जो फाइव स्टार संस्कृति उभरकर सामने आ रही है वह वाकई चिंताजनक हैं क्योंकि अब कई जगह तो शादी विवाह से भी ज्यादा भव्यता के साथ आयोजन होने लगे हैं कई जगह तो कई कई मिठाईंया सब्जियां पूरी कचौड़ी रोटियां तरह तरह की परोसी जाती है तो अब यह भी पता चला है कि अपने देश में भी विदेशियों की तरह बड़े छोटे होटलों में भी तेरहवीं के आयोजन होने लगे हैं। अगर किसी की इच्छा है तो उसे रोका तो नहीं जा सकता और ना ही इसके प्रयास होने चाहिएं मगर क्योंकि इससे जो मध्यम दर्जे का व्यक्ति है वह समाज में अपनी प्रतिष्ठा कायम करने हेतु ऐसे आयोजनों में जो पैसा ब्याज पर लेकर या अपना घर आदि गिरवी रख ले रहा है वह शुरूआत खतरनाक कीं जा सकती है क्योंकि इससे परिवार में आर्थिक परेशानियां और उसके बाद मानसिक तनाव जो परिवार में झगड़े उत्पन्न करता है उससे कितने ही लोग उभर नहीं पाते हैं।
आये दिन खबरें पढ़ने को मिलती है कि विभिन्न जातियों की पंचायत में तेरहवीं में प्रतिभोज और फिजूलखर्ची तथा शादियों में दहेज लेने पर रोक लगायी जाये। और इस मामले में अब कई बार मुस्लिमों की पंचायतों में भी निर्णय लिये जाते हैं और ग्रामों में रहने वाले सभी जातियों के लोग अपने समाज के साथ-साथ अन्यों को भी यह सीख देने का प्रयास कर रहे हैं कि मध्यम दर्जे के व्यक्ति की व्यवस्थाओं को देखते हुए इस प्रकार के भव्य आयोजन बंद किये जाये अगर किसी को अपने बिछुड़ जाने वाले की आत्मा की शांति के लिए कुछ करना ही है तो वह किसी गरीब लड़की की शादी करा सकता है और जो लोग घर से बाहर निकल कर मांग नहीं सकते उनके घरों में भोजन भिजवा सकता है। अथवा सामूहिक भंडारे कर सकता है जिससे गरीब आदमी को प्रसाद के रूप में पेट भर भोजन मिल जाये।
क्योंकि जो सबसे ज्यादा गरीबी में जीवन जी रहा है उसका एक अलग ही एक समाज है वह उड़द चावल बनवाकर भी अपने समाज में प्रतिष्ठा कायम कर सकता है उसे दिखावे की जरूरत नहीं होती। कहने का आशय सिर्फ इतना है कि हमारे पूर्वजों द्वारा जो विभिन्न प्रकार से हमें एक दूसरे की मदद करने और समाज को बांधे रखने का संदेश दिया गया हैं उसके तहत अगर ऐसे मौकों पर कार्यक्रम हो तो कोई बुराई नहीं है लेकिन कुछ भी हो इस दुख के मौके पर फाईव स्टार कल्चर अपनाकर नए नए और स्वादिष्ट भोजन परोसे जाने पर आदमी को खुद ही रोक लगानी चाहिए क्योंकि जो वह है उसे सभी जानते हैं समाज में इससे कोई विशेष पहचान बनने वाली नहीं है मेरा मानना है कि अगर हमारी युवा पीढ़ी इस मामले में आकर अपने बड़ों को समझाये और अगर फिर भी वह कुछ करना चाहते हैं तो मंदिर और धर्मशालाओं का निर्माण कराये अथवा जो गौशाला और धार्मिक संगठन चल रहे है उनमें मदद करें लेकिन यह दिखावा परिवार और समाज हित में होना चाहिए।
-भावनात्मक प्रस्तुति:-अंकित बिश्नोई राष्ट्रीय महामंत्री सोशल मीडिया एसोसिएशन एसएमए व पूर्व सदस्य मजीठिया बोर्ड यूपी संपादक पत्रकार
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